आज दुनिया की आधी आबादी दवाइयों पर ही जिन्दा है। ऐसे में मार्किट में कई तरह की दवाइयां मार्किट में उपलब्ध है। जिनमे टैबलेट्स, कैप्सूल्स, इंजेक्शन या सीरप शामिल हैं। बता दें इन मेदिसिन्नेस को किसी न कीस तरह के कवर में डाला जाता है। वहीँ कुछ मेडिसिन्स कई टेक्निकों के इस्तेमाल से कवर किया जाता है। इसमें एक मेडिसिन है जो आप सब ने कभी न कभी तो हाई ही होगी, वो है कैप्सूल। जी हां इसे किसी खास तरह के कवर में रखा जाता है। तो अज इई के बारे में जानते हैं।
इनकैप्सुलेशन क्या होता है
दरअसल कैप्सूल के अंदर दवाइयों को पीस कर पाउडर भर दिया जाता है। वहीँ कैप्सूल बनाने के तरीके को इनकैप्सुलेशन कहते हैं। लेकिन ऐसे में एक सवाल उठता है आखिर कैप्सूल का कवर बनता किस तरह से है। आप मे से बहुत से लोग इसे प्लास्टिक से बना समझते हैं। हालांकि ये कवर जिलेटिन से बनता हैं।
कैप्सूल कवर ‘जिलेटिन’ से बनता है
दरअसल कैप्सूल के पैकेट या डिब्बे पर मौजूद मेडिसिन कंटेंट की जानकारी दी जाती है। लेकिन, कई कंपनियां ये नहीं बताती हैं कि कैप्सूल कवर ‘जिलेटिन’ से बना हुआ होता है। वहीँ इसको जानवरों की हड्डियों या स्किन को उबालकर निकाला जाता है। इसके बाद इसे प्रॉसेस कर चमकदार और लचीला बना दिया जाता है। कैप्सूल को खास उन लोगों के लिए बनाया गया था, जो दवा को निगलने में कतराते हैं। कैप्सूल से दवाई निगलना आसान हो जाता है।
कितनी तरह के होते हैं कैप्सूल कवर
कैप्सूल कवर दो तरह के होते हैं, पहला हार्ड शेल्ड होता है तो वहीं दूसरा सॉफ्ट शेल्ड। दोनों ही तरह के कैप्सूल कवर्स जानवरों के साथ-साथ प्रोटीन वाले पेड़-पौधों के लिक्विड से तैयार किये जाते हैं। जो कैप्सूल्स के कवर जानवरों के प्रोटीन से बनते हैं। उनको जिलेटिन कहते हैं। इसमें मुर्गा, मछली, सुअर और गाय के साथ कई प्रजाति के बाकी जानवरों की हड्डियों या त्वचा को उबालकर निकाल लिया जाता है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक जिलेटिन आधारित कैप्सूल का अधिक इस्तेमाल किया जाता है जो किडनी और लीवर को नुकसान देता है। जो कैप्सूल कवर्स प्रोटीन वाले पेड़-पौधों के लिक्विड से बनते हैं उन्हें सेल्यूलोज कहते हैं। ये पूरी तरह से नेचुरल होते हैं। इस तरह के कैप्सूल को हमारा पाचन तंत्र आसानी से पचा लेता है। किसी तरह का कोई सीसे इफ़ेक्ट भी नहीं होता है।
किस तरह से काम करता है ये शरीर
जब हम कैप्सूल मेडिसिन लेते हैं तो उसका कवर शरीर में जाकर घुल जाता है और इसके बाद दवाई शरीर में अपना काम करती है। कवर से हमारे शरीर को प्रोटीन मिलता है। जिलेटिन से बना ये कवर शरीर को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाता है। कई हेल्थ रिसर्च में दावा किया गया है कि ज्यादातर फार्मा कंपनियां पशुओं के उत्पादों से बने जिलेटिन कवर वाले कैप्सूल बेचती हैं।
कैप और कंटेनर से मिलकर बनता है कैप्सूल
कैप्सूल बनाने में जिलेटिन और सैल्यूलोज के कवर का यूज़ होता है। इस कवर में दवाई पीस कर भर दी जाती है। कैप्सूल के कवर को दो अलग रंगों से बनाया जाता है। इसका कारण कैप्सूल को खूबसूरत बनाना नहीं होता है। इसके पीछे एक बड़ा कारण होता है। कैप्सूल दो हिस्से में होता है।
एक हिस्से को कंटेनर कहते हैं, इसमें दवाई भरी जाती है। वहीं दूसरे हिस्से को कैप कहते हैं। जिससे कैप्सूल को बंद किया जाता है। कैप और कंटेनर का रंग इसलिए अलग रखा जाता है, जिससे कैप्सूल बनाते समय कर्मचारियों से कोई गड़बड़ न हो।
