आजकल फोन के बिना अपनी लाइफ के बारे में सोचना हर किसी के लिए बहुत मुश्किल है। फोन सिर्फ उसी समय दूर होता है जब चार्जिंग पर लगा हो लेकिन हमेशा फोन के साथ घिरे रहने के कारण बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाएगा और इसका नाम है पॉपकार्न ब्रेन। ऐसे लोगों को ये परेशानी होती है जो कई स्लो एक्टिविटीज पर फोकस न कर पाएं। इस बीमारी का नाम यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन के साइंटिस्ट डेविड एम लेवी ने दिया था।
पॉपकॉर्न ब्रेन का शरीर पर असर
इसके कारण नोटिफिकेशन के पॉपिंग इफेक्ट्स, लाइक्स से क्विक डोपमाइन हिट और कंटेंट की इंडलेस प्रभावित होती है जहां तकनीक ने हमारी जिंदगी के जीने और कम्यूनिकेशन का तरीका ही बदल दिया है इसके कारण मेंटल हेल्थ, प्रोडक्टिविटी और सोशल वेलबींग के लिए भी कई चुनौतियां भी सामने आई हैं और पॉपकॉर्न ब्रेन भी उसी में से एक समस्या है।

कारण
हर समय नोटिफिकेशन आने के कारण यह समस्या होती है इससे दिमाग का अटेंशन जरूरी काम से हट जाता है जिसके कारण न सिर्फ डिस्ट्रप्टेड प्रोडक्टिविटी में फर्क होता है बल्कि एक हाइपर अलर्ट ब्रेन को बनाए रखने में भी पड़ता है इससे स्ट्रेस लेवल बढ़ जाएगा। इंसान के दिमाग को अक्सर नयेपन की लत लग जाएगी और इसी बात का फायदा डिजिटल कंपनीज को हाता है आप लगातार ऐसे कंटेंट की सप्लाई देने लगते हैं जो आपके दिमाग को घेरेंगी। इसमें सोशल नेटवर्किंग साइट, मैसेजिंग ऐप, लाइव स्ट्रीमिंग के जाल में फंसना जैसी समस्याएं शामिल है। इसके कारण शरीर में डोपामिन रिलीज होता है, जिसको ‘फील गुड हॉर्मोन’ कहते हैं।
नुकसान
जब आप ‘पॉपकॉर्न ब्रेन’ के शिकार होते हैं तो आप किसी भी मीनिंगफुल काम से दूर हो जाएंगे। जैसे कि कोई भी पॉजिटिव बात करना, किताबें पढ़ना, नई स्किल सीखना, ट्रैवल करना। इसके कारण आपको डिप्रेशन, एंग्जाइटी जैसी समस्याएं होने लगेगी और आप कनेक्टेड रहने का प्रेशर महसूस करेंगे। इसके अलावा स्क्रीन पर पड़ने वाली ब्लू लाइट भी आपकी आंखों को नुकसान पहुंचाएगी और आपकी नींद को डिस्टर्ब करेगी।

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले डॉक्टर या एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
