हाल ही में दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें समलैंगिकों के रक्तदान पर लगी रोक को हटाने की मांग की गई है। याचिका में यह आग्रह किया गया है कि LGBTQI+ समुदाय के सदस्यों को भी रक्तदान करने की अनुमति दी जाए। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ करेगी, जिसमें मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल हैं। ऐसे में आज के दिन इस मामले पर सुनवाई की जाएगी।
इन लोगों को रक्तदान करने की मनाही
याचिका में भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय रक्त आधान परिषद (NBTC) और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) के 2017 में बनाए गए नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। इन नियमों के तहत पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाने वाले पुरुष (MSM), महिला सेक्स वर्कर और एचआईवी पॉजिटिव व्यक्तियों को रक्तदान से प्रतिबंधित किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह नियम भेदभावपूर्ण हैं और LGBTQI+ समुदाय के अधिकारों का हनन करते हैं।
याचिका में क्या कहा गया
याचिका में कहा गया है कि इन नियमों का आधार वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित नहीं है और यह नियम सामाजिक पूर्वाग्रहों से प्रेरित हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि रक्तदान की प्रक्रिया में रक्त की सुरक्षा की जांच के लिए व्यापक जांच होती है, जिसमें संक्रमणों की पहचान की जाती है। ऐसे में किसी व्यक्ति की यौन प्राथमिकताओं के आधार पर रक्तदान से रोक लगाना अनावश्यक और अनुचित है।
संविधान के इन अनुच्छेदों का उल्लंघन
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया है कि इस तरह के नियम LGBTQI+ समुदाय के सदस्यों के साथ भेदभाव करते हैं और उन्हें समाज में समानता और गरिमा से वंचित करते हैं। यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करते हैं, जो समानता, भेदभाव रहित समाज और जीवन के अधिकार की गारंटी देते हैं।
यह प्रतिबंध वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित नहीं
इसके अलावा याचिकाकर्ता ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया, जो यौन प्राथमिकताओं के आधार पर रक्तदान पर प्रतिबंध लगाने के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा कि कई देशों में इस तरह के प्रतिबंध हटा दिए गए हैं या कम कर दिए गए हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि यह प्रतिबंध वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित नहीं हैं।
आपको बता दें कि इस याचिका के माध्यम से LGBTQI+ समुदाय के अधिकारों की रक्षा और उन्हें समाज में समानता दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ इस महत्वपूर्ण मामले पर आज विचार करेगी और इसका निर्णय LGBTQI+ समुदाय के भविष्य के अधिकारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
