बॉलीवुड और ओटीटी की जानी-मानी एक्ट्रेस अनुष्का रंजन ने हाल ही में मई 2026 में अपने पहले बच्चे के आगमन की खुशखबरी साझा की। लेकिन इस सुनहरे पल के पीछे छुपा था एक ऐसा दर्दनाक संघर्ष, जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर कर रख दिया था। वेब सीरीज ‘फितरत’ से अपनी पहचान बनाने वाली 35 वर्षीय अनुष्का ने आईवीएफ (IVF) के उस थका देने वाले सफर से पर्दा उठाया है, जिससे आज न जाने कितनी महिलाएं बंद कमरों में अकेले जूझ रही हैं।

“मुझे 150 से ज्यादा इंजेक्शन लगवाने पड़े… एक वक्त ऐसा आया जब मैं मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह टूट चुकी थी। मुझे लगने लगा था कि शायद कमी मुझमें ही है।”
— अनुष्का रंजन

मातृत्व की चाह और ‘मदर्स प्राइड’ के पीछे का छुपा रोना

शादी के बाद मां बनना हर महिला के लिए एक खूबसूरत ख्वाब होता है, लेकिन जब कुदरत इम्तिहान लेने पर आ जाए, तो यह सफर सिर्फ शारीरिक नहीं रह जाता। अनुष्का रंजन ने साल 2021 में एक्टर आदित्य सील से सात फेरे लिए थे। शादी के पांच साल बाद जब उनकी प्रेग्नेंसी की खबर आई, तो फैंस की खुशी का ठिकाना नहीं था। मगर इस मुस्कुराहट के पीछे छिपी मानसिक प्रताड़ना और ‘मदरहुड’ को पाने की जद्दोजहद की कड़वी सच्चाई अब दुनिया के सामने आई है।

‘सेल्फ-ब्लेम’ का चक्रव्यूह: जब औरत खुद को ही समझने लगती है गुनहगार

अनुष्का ने अपने इस दर्दनाक खुलासे में सबसे बड़ी चोट ‘सेल्फ-ब्लेम’ (खुद को दोषी मानने) की मानसिकता पर की है। उन्होंने बेहद बेबाकी से स्वीकार किया कि जब बार-बार कोशिशों के बाद भी नाकामी हाथ लग रही थी, तो वो हीन भावना का शिकार होने लगी थीं।

यह सिर्फ अनुष्का की कहानी नहीं है; यह हमारे समाज का वो कड़वा सच है जहां इनफर्टिलिटी (बांझपन) का पूरा ठीकरा आज भी सिर्फ महिला के सिर ही फोड़ा जाता है। इसी सामाजिक दबाव के चलते लाखों महिलाएं बिना किसी गलती के खुद को कसूरवार मानकर घुटती रहती हैं।

गर्भ से गोद तक: आईवीएफ (IVF) का स्टेप-बाय-स्टेप साइंस

आईवीएफ का सीधा सा गणित है—महिला के शरीर से अंडे (Eggs) बाहर निकालना, लैब में पुरुष के स्पर्म (Sperm) के साथ उनका मिलन कराना और तैयार भ्रूण (Embryo) को वापस कोख में सुरक्षित रख देना। यह पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया 5 मुख्य पड़ावों से गुजरती है:

पड़ाव 1: ओवेरियन स्टिमुलेशन — अंडों की ‘फैक्ट्री’ तैयार करने का मुश्किल दौर

समयसीमा: 10 से 12 दिन (सबसे ज़्यादा इंजेक्शन)

प्रक्रिया: कुदरती तौर पर महिला के शरीर में हर महीने केवल एक अंडा बनता है। लेकिन आईवीएफ को कामयाब बनाने के लिए कई अंडों की दरकार होती है। इसके लिए पीरियड्स के दूसरे या तीसरे दिन से रोजाना हॉर्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं। इस दौरान डॉक्टरों की टीम हर 2-3 दिन में अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट के जरिए अंडों की ग्रोथ पर पैनी नजर रखती है।

पड़ाव 2: ट्रिगर शॉट — वो एक इंजेक्शन, जिस पर टिकी होती है पूरी उम्मीद

समयसीमा: सटीक 36 घंटे पहले (1 सबसे महत्वपूर्ण इंजेक्शन)

प्रक्रिया: जब अंडे सही आकार में आ जाते हैं, तो उन्हें पूरी तरह पकाने के लिए एक फाइनल इंजेक्शन दिया जाता है, जिसे ‘ट्रिगर शॉट’ कहते हैं। इसके ठीक 36 घंटे बाद अंडों को बाहर निकालना होता है। इस स्टेप में समय का पंचुअल होना बेहद जरूरी है, जरा सी चूक पूरी मेहनत पर पानी फेर सकती है।

पड़ाव 3: एग रिट्रीवल — बेहोशी की नींद और सुइयों का वो माइनर ऑपरेशन

समयसीमा: 20 से 30 मिनट

प्रक्रिया: यह एक छोटा सा सर्जिकल प्रोसीजर है। महिला को हल्का एनेस्थीसिया दिया जाता है ताकि उन्हें दर्द का अहसास न हो। डॉक्टर अल्ट्रासाउंड की मदद से एक बारीक सुई को योनि (Vagina) के रास्ते ओवरी तक ले जाते हैं और अंडों को बाहर खींच (Aspire) लेते हैं। इसी दिन पुरुष का स्पर्म सैंपल भी लैब में लिया जाता है।

पड़ाव 4: फर्टिलाइजेशन — लैब की पेट्री डिश में सुलगती नई जिंदगी की चिंगारी

समयसीमा: 3 से 5 दिन

प्रक्रिया: बाहर निकाले गए अंडों और स्पर्म को लैब के नियंत्रित माहौल में एक साथ रखा जाता है। अगर स्पर्म काउंट कमजोर हो, तो आधुनिक ICSI तकनीक के जरिए एक-एक स्पर्म को सीधे अंडे के अंदर इंजेक्ट किया जाता है। अगले 3 से 5 दिनों में ये फर्टिलाइज होकर नन्हे भ्रूण (Embryo) की शक्ल ले लेते हैं।

पड़ाव 5: एम्ब्रियो ट्रांसफर — कोख में ‘नन्ही उम्मीद’ को महफूज रखने का आखिरी पल

समयसीमा: 15 से 20 मिनट

प्रक्रिया: लैब में तैयार हुए सबसे सेहतमंद भ्रूण को एक बेहद पतली और लचीली कैथेटर ट्यूब के जरिए महिला के गर्भाशय (Womb) में ट्रांसफर कर दिया जाता है। यह पूरी तरह से दर्द रहित प्रक्रिया है जिसमें एनेस्थीसिया की जरूरत नहीं होती। इसके करीब 12-14 दिन बाद किए जाने वाले ब्लड टेस्ट (Beta HCG) से तय होता है कि कोख आबाद हुई या नहीं।

सुइयों का वो अंतहीन जाल: आखिर क्यों छननी करना पड़ता है शरीर?

आईवीएफ के दौरान लगने वाले सैकड़ों इंजेक्शनों के पीछे डॉक्टरों का एक तय मेडिकल प्रोटोकॉल होता है:

डाउन-रेगुलेशन

महिला के अपने प्राकृतिक हॉर्मोन्स को शांत करने के लिए ताकि अंडे समय से पहले खुद-ब-खुद न रिलीज हो जाएं (रोजाना 1 इंजेक्शन)।

स्टिमुलेशन

अंडों के साइज और संख्या को बढ़ाने के लिए (10-12 दिनों तक रोजाना 1 से 2 इंजेक्शन)।

लूटियल सपोर्ट (सबसे कठिन दौर)

एम्ब्रियो ट्रांसफर के बाद भ्रूण को गर्भाशय में मजबूती से चिपके रहने और पोषण देने के लिए प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) के इंजेक्शन दिए जाते हैं। ये ऑयल-बेस्ड (गाढ़े) इंजेक्शन होते हैं जो काफी दर्द देते हैं और प्रेग्नेंसी के शुरुआती 3 महीनों तक लग सकते हैं। यही वो फेज है जो महिलाओं को शारीरिक रूप से पूरी तरह तोड़ देता है।

विज्ञान की एक राहत भरी बात

राहत की बात यह है कि हर महिला का शरीर अलग होता है। आज के आधुनिक दौर में ‘मिनिमल स्टिमुलेशन’ और ओरल मेडिसिन (दवाइयों) के जरिए भी आईवीएफ मुमकिन है, जिससे इंजेक्शनों की संख्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि, गंभीर इनफर्टिलिटी के मामलों में आज भी यह लंबा रास्ता तय करना ही पड़ता है।

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले डॉक्टर या एक्सपर्ट्स की सलाह जरूर लें।

By tnm

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