मोतियाबिंद एक ऐसी बीमारी है, जिसे हम अक्सर बुजुर्गों से जोड़कर ही देखते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह बढ़ती उम्र की बीमारी है। ज्यादातर बुजुर्गों को यह समस्या हो जाती है। यह एक तरह की मेडिकल कंडीशन है जिसका इलाज मौजूद है लेकिन, क्या कभी आपने सुना है कि शिशुओं को भी मोतियाबिंद हो सकता है? जी, हां यह बात बिल्कुल सच है कि शिशुओं को भी मोतियाबिंद हो सकता है हालांकि, इसके पीछे कई तरह के कारक जिम्मेदार हैं। आज वर्ल्ड साइट डे मनाया जा रहा है ऐसे में इस आर्टिकल के जरिए हम आपको यही बताएंगे कि आखिर बच्चों को मोतियाबिंद होना कितना सामान्य है और इसके लक्षण, कारण तथा इलाज कैसे संभव है। आइए जानते हैं विस्तार से।

क्या शिशुओं में मोतियाबिंद सामान्य ही है?

यह सच है कि मोतियाबिंद बुजुर्गों में होने वाली बीमारी है लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि छोटे बच्चों को यह बीमारी नहीं हो सकती। इस संबंध में एक्सपर्ट्स का कहना है कि – ‘अक्सर मोतियाबिंद शब्द बोलते ही हमारे दिमाग में एक ऐसी छवि बनती है, जिसमें एक बुजुर्ग व्यक्ति मोटे काले चश्मे पहने हुए है मगर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि छोटे बच्चों को भी यह बीमारी हो सकती है। वैसे यह बहुत सामान्य नहीं है लेकिन, सही समय पर इसका इलाज न किया जाए तो बच्चे की आंखों की रोशनी का विकास भी प्रभावित हो सकता है।

शिशुओं में मोतियाबिंद होने का मतलब

जैसा कि आपको साफ होगा कि मोतियाबिंद एक आंखों से जुड़ी मेडिकल कंडीशन है। यह बीमारी होने पर व्यक्ति की आंखों रोशनी धुंधली होने लगती है क्योंकि आंखों की नेचुरल लेंस खराब हो रही होती है। आमतौर पर बढ़ती उम्र के आंखों की रोशनी धुंधली हो जाती है, इसलिए इसे बुजुर्गों की बीमारी कहतो हैॆ। छोटे बच्चों में यह बहुत रेयर यानी दुर्लभ ही नजर आती है। आंकड़े बताते हैं 1000 में से महज 1 से 6 बच्चों को मोतियाबिंद होने का जोखिम रहता है।

कारण

शिशुओं में मोतियाबिंद होने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, जैसे।

अंतर्गर्भाश्यी संक्रमण

अगर किसी महिला को प्रेग्नेंसी के दौरान अंतर्गर्भाशयी संक्रमण हुआ है तो भी बच्चे में मोतियाबिंद को जोखिम बढ़ सकता है। संक्रमण जैसे कि सिफलिस, रुबेला आदि गर्भ में पल रहे शिशु की आंखों की नेचुरल लेंस को प्रभावित कर सकती हैं।

जेनेटिक

शिशुओं में मोतियाबिंद होने का सबसे मुख्य कारण है अनुवांशिक यानी की जेनेटिक। इसका मतलब है कि यदि परिवार में पहले किसी को यह बीमारी रही है तो शिशु को भी यह समस्या हो सकती है।

मेटाबॉलिक डिसऑर्डर

जैसे कि गैलेक्टोसिमिया भी जन्मजात मोतियाबिंद होने का कारण बन सकता है। वहीं, यदि प्रसव के दौरान शिशु की आंखों को किसी तरह का चोट लगी हो तो भी मोतियाबिंद होने का रिस्क बढ़ जाता है।

लक्षण

.आंखों की पुतलियों का ग्रे होना ऐसा लगना जैसे पुतलियों में बादल छाए हुए हैं।

.शिशु का हिलती चीजों को देखने के बावूजद प्रतिक्रिया न करना।

. रैपिड आई मूवमेंट करना

. लाइट के प्रति शिशु के आंखों की सेंसिटिविटी का बढ़ना

इलाज

शिशुओं में मोतियाबिंद का इलाज करने के लिए कई तरह के उपाय अपनाए जाते हैं, जैसे।

सर्जरी

जैसे ही शिशु में मोतियाबिंद का पता चलता है, डॉक्टर जल्द से जल्द सर्जरी करने को ही महत्व देते हैं, ताकि बच्चे की आंखों की रोशनी स्थाई रूप से खत्म न हो।

क्लाउडी लेंस

शिशु के आंखों की सर्जरी की मदद से क्लाउडी लेंस को रिमूव किया जाता है। सर्जरी में असली लेंस की जगह आर्टिफिशियल लेंस लगाए जाते हैं हालांकि, शिशु में मोतियाबिंद का किस तरह की सर्जरी होगी, यह निर्णय डॉक्टर खुद लेते हैं।

बच्चे का रखें ध्यान

सर्जरी के बाद भी बच्चे को काफी केयर की जरूरती होती है। इस संबंध में डॉक्टर पेरेंट्स को जो सलाह और सावधानियों के बारे में पेरेंट्स को बताते हैं उन्हें उसे जरूर फॉलो करना चाहिए।

रेगुलर चेकअप करवाएं

सर्जरी के बाद नियमित रूप से डॉक्टर के पास रेगुलर चेकअप के लिए जाना न भूलें।

By tnm

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