आजकल की जिंदगी इतनी तेजी से चल रही है,अगर इसकी तुलना पिछले कुछ सालों से करी जाए तो काफी अंतर आ चुका है। लोगों में भी समय के साथ-साथ बहुत बदलाव आया है। सबसे ज्यादा माता-पिता का कहना है कि आज के समय में यंग बच्चे जो 13-17 साल के बीच हैं अगर उनकी तुलना 20 साल के पहले वालों बच्चों से की जाए तो उनकी जिंदगी बहुत टफ हो चुकी है।

13 से 17 वर्ष की आयु के 44% बच्चे भी यही कहते हैं, लेकिन बच्चे इस बात पर सहमत नहीं होते कि सोशल मीडिया की वजह से उनकी किशोरावस्था से निपटना मुश्किल है, बल्कि वह अधिक दबाव और उम्मीदों को दोषी मानते हैं। ये तो सभी को पता है कि सोशल मीडिया का कितना बुरा असर पड़ता है, खासकर सबसे ज्यादा यौवन पर। अपनी सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताब “द एंग्ज़ियस जेनरेशन” में NYU के सामाजिक मनोवैज्ञानिक जोनाथन हैडट का कहना है कि स्मार्ट फ़ोन और सोशल मीडिया ने किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाया है।

किशोरावस्था में आती हैं ये परेशानियों

गौरतलब है कि ऑनलाइन यौवन से गुज़र रहे बच्चों में पिछली पीढ़ियों के किशोरों की तुलना में कहीं ज़्यादा सामाजिक तुलना, आत्म-चेतना, सार्वजनिक रूप से शर्मिंदगी और पुरानी चिंता का अनुभव होने की संभावना है। उदाहरणों में नुकसान की ऐसी तकनीकें शामिल हैं जो व्यक्तिगत जुड़ाव को खत्म करती हैं।

बातचीत की गुणवत्ता को कम करती है और यहां तक कि हमारे आत्म-सम्मान को भी कम करती है। इससे अकेलापन, छूट जाने का डर, संघर्ष और सामाजिक जुड़ाव में भी कमी आ सकती है। प्यू रिसर्च सेंटर का कहना है कि माता-पिता इस आकलन से सहमत हैं, 41% का कहना है कि सोशल मीडिया के कारण किशोर रहना कठिन है, तथा 26% का कहना है कि इसका कारण सामान्य रूप से प्रौद्योगिकी है।

By tnm

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