राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने हाल ही में अपने फोरेंसिक मेडिसिन एवं विष विज्ञान पाठ्यक्रम में ‘सोडोमी’ और ‘लेस्बियनिज्म’ को फिर से कुकृत्य के तौर पर पेश किया है। इस फैसले ने चिकित्सा शिक्षा और सामाजिक दृष्टिकोण पर बहस छेड़ दी है। पहले 2022 में मद्रास हाई कोर्ट के निर्देश पर इन विषयों को पाठ्यक्रम से हटा दिया गया था, लेकिन अब एनएमसी ने इन्हें पुनः शामिल कर लिया है।

सोडोमी और लेस्बियनिज्म क्या हैं

सोडोमी शब्द का प्रयोग उस स्थिति में किया जाता है जब एक पुरुष द्वारा दूसरे पुरुष के साथ जबरन यौन संबंध बनाए जाते हैं। वहीं, लेस्बियनिज्म दो महिलाओं के बीच यौन संबंधों को परिभाषित करता है। इन दोनों विषयों को एनएमसी ने अपने फोरेंसिक मेडिसिन पाठ्यक्रम में कुकृत्य के रूप में शामिल किया है। यह फैसला LGBTQ+ समुदाय के अधिकारों और मान्यताओं के साथ सीधा टकराव पैदा करता है, क्योंकि समलैंगिकता को कई देशों में कानूनी मान्यता मिली हुई है। भारत में भी 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था।

फोरेंसिक मेडिसिन में अन्य विषयों की पुनः प्रस्तुति

सोडोमी और लेस्बियनिज्म के साथ-साथ एनएमसी ने ‘हाइमन’ और उसके प्रकार, कौमार्य और कौमार्यभंग से संबंधित विषयों को भी पाठ्यक्रम में पुनः शामिल किया है। इन विषयों का चिकित्सीय और कानूनी महत्व पाठ्यक्रम में परिभाषित किया गया है। कौमार्य और उसकी वैधता को लेकर भी विवाद हो सकता है, क्योंकि यह विषय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों से जुड़ा हुआ है।

मद्रास हाई कोर्ट के निर्देश

2022 में मद्रास हाई कोर्ट के आदेशानुसार, इन विषयों को फोरेंसिक मेडिसिन और विष विज्ञान के पाठ्यक्रम से हटा दिया गया था। उस समय यह माना गया था कि ये विषय समाज की बदलती धारणाओं और समलैंगिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप नहीं थे। लेकिन अब एनएमसी ने इन्हें दोबारा पाठ्यक्रम में शामिल करके यह संकेत दिया है कि चिकित्सा शिक्षा में कानूनी और नैतिक विषयों पर फिर से विचार किया जा रहा है।

पाठ्यक्रम में अन्य कानूनी विषयों की वापसी

एनएमसी के संशोधित पाठ्यक्रम में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए), और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) को भी शामिल किया गया है। इसके साथ ही, सिविल और आपराधिक मामलों की जांच, पुलिस और मजिस्ट्रेट द्वारा जांच प्रक्रिया, और संज्ञेय व गैर-संज्ञेय अपराधों पर भी जानकारी दी गई है।

एनएमसी की शिक्षा संबंधी दिशा-निर्देश

एनएमसी ने अपने 2024 के चिकित्सा शिक्षा पाठ्यक्रम (सीबीएमई) दिशानिर्देशों में यह स्पष्ट किया है कि चिकित्सा शिक्षा के मौजूदा नियमों और दिशानिर्देशों पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है। एनएमसी ने कहा है कि बदलती जनसांख्यिकी, सामाजिक-आर्थिक संदर्भ, धारणाओं, मूल्यों, और चिकित्सा शिक्षा में हो रहे नए बदलावों के अनुसार पाठ्यक्रम को ढालना जरूरी हो गया है।

सामाजिक दृष्टिकोण और विवाद

सोडोमी और लेस्बियनिज्म को कुकृत्य के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल करना सामाजिक दृष्टिकोण से विवादास्पद हो सकता है। LGBTQ+ समुदाय और उनके समर्थक इसे अधिकारों और स्वतंत्रता के खिलाफ मान सकते हैं। भारत में 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 377 को समाप्त कर दिया गया था, जिसके बाद समलैंगिकता को अपराध नहीं माना जाता है। ऐसे में इन विषयों को कुकृत्य के रूप में प्रस्तुत करना समाज के कुछ वर्गों द्वारा विरोध का कारण बन सकता है।

फोरेंसिक मेडिसिन का उद्देश्य

एनएमसी ने यह भी स्पष्ट किया है कि फोरेंसिक मेडिसिन और विष विज्ञान का अध्ययन करने वाले छात्रों को चिकित्सा-कानूनी ढांचे, चिकित्सा नैतिकता, पेशेवर कदाचार और चिकित्सा लापरवाही जैसे विषयों को समझने में सक्षम होना चाहिए। इसके अलावा, छात्रों को चिकित्सा पेशे से जुड़े नवीनतम कानूनी प्रावधानों और अदालती फैसलों की जानकारी भी दी जानी चाहिए।

By tnm

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