एक स्टडी की मानें तो भारत में करीबन 5.7 करोड़ लोग डिप्रेशन से जूझ रहे हैं। इस बीमारी की चपेट में आने पर लोग खुलकर बात करना और इसका इलाज करवाना भी जरुरी नहीं समझते या फिर डॉक्टर के पास भी नहीं जाते हैं। साइकोलॉजिस्ट के संपर्क में आने के बाद थेरेपी और ड्रग्स का सिलसिला शुरु हो जाता है। यही ड्रग्स डिप्रेशन से बाहर आने में मदद करते हैं लेकिन हमारे स्वास्थ्य पर इन ड्रग्स का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अब एक रिसर्च में खुलासा हुआ है कि अच्छी डाइट प्लान करना और ज्यादा एक्सरसाइज करने से भी डिप्रेशन को हराने में थेरेपी जितनी ही मदद मिलती है।
लाइफस्टाइल बदलने से दूर होगा डिप्रेशन
ऑस्ट्रेलिया की डीकिन यूनिवर्सिटी के फूड एंड मूड सेंटर की ओर से इसी हफ्ते पब्लिश हुई रिसर्च में यह दावा किया गया है कि यह ऐसा दुनिया का पहला ट्रायल है इससे पहले की गई रिसर्च में यह साफ हुआ था कि लाइफस्टाइल बदलना डिप्रेशन से लड़ने में मददगार हो सकती है लेकिन इसकी तुलना कभी भी साइकोलॉजिकल थेरेपी से नहीं की गई थी।
ऐसे हुई रिसर्च
डीकिन यूनिवर्सटी विक्टोरिया में स्थित है। कोविड लॉकडाउन के दौरान विक्टोरिया में डिप्रेशन के कई मामले सामने आ रहे थे जबकि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएं बहुत सीमित थी। इस रिसर्च के लिए विक्टोरिया के उन लोगों को चुना गया तो अधिक तनाव के साथ में जी रहे थे यानी की ऐसे लोग जिन्हें कम से कम हल्का डिप्रेशन था जिन लोगों में उदासी, मायूसी और झुंझलाहट जैसे लक्षण दिखे उन्हें इस स्टडी के लिए चुना गया। फूड एंड मूड सेंटर के प्रोफेसर एड्रिएन ओनील और एसोसिएट रिसर्च फेलो सोफी महोनी ने बताया कि उन्होंने इस काम के लिए स्थानीय मेंटल हेल्थ सेवाओं के साथ मिलकर 182 लोगों को चुना और जूम पर पूरे ग्रूप को एक साथ ही संबोधित किया। सभी प्रतिभागियों ने आठ हफ्तों के दौरान 6 सत्रों में हिस्सा लिया इस ग्रुप के आधे लोगों ने एक डाइटीशियन और एक्सरसाइज साइकोलॉजिस्ट के दिशा निर्देशों का पालन करते हुए एक खास तरह का खाना खाया और वर्कआउट किया।
दूसरे ग्रूप के लोगों ने दो मानसिक रोग एक्सपर्ट्स के साथ साइकोथेरपी सेशन में हिस्सा लिया। इस प्रोग्राम में कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी का सहारा लिया गया। यह थेरेपी मुख्यतौर पर तब दी जाती है जब एक साथ कई लोगों को संभालना हो या थेरेपिस्ट और मरीज एक-दूसरे से दूर हों। लाइफस्टाइल थेरेपी वाले मरीजों को जहां खाने की एक टोकरी दी गई वहीं साइकोथेरेपी वाले ग्रूप को कलरिंग बुक, स्ट्रेस बॉल और हेड मसाजर दिया गया। दोनों ग्रूप्स के लोगों ने अपने नए इलाज के साथ-साथ पुराने इलाज भी जारी रख सकते थे।
कुछ ऐसे रहे नतीजे
रिसर्च के नतीजों में सामने आया कि इलाज के दोनों ही तरीके लगभग बराबर के फायदेमंद है। स्टडी की शुरुआत में हर प्रतियोगी को उनकी बताई गई मानसिक स्थिति के आधार पर नंबर दिए गए थे। आठ हफ्तों के बाद स्टडी खत्म होने पर एक बार फिर सभी का आंकलन किया गया। जिन मरीजों के लाइफस्टाइल में बदलाव किए गए थे उनके कुल स्कोर में 42% की गिरावट देखी गई, जिन मरीजों को मानसिक थेरेपी दी गई उनके स्कोर में 37 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
दोनों ग्रूप्स में कुछ फर्क भी नजर आए जैसे लाइफस्टाइल प्रोग्राम वाले मरीजों की डाइट बेहतर हो गई जबकि साइकोथेरेपी कार्यक्रम वाले मरीजों ने अपने आस-पास समाज में एक बेहतर सपोर्ट सिस्टम महसूस किया। इसमें खास बात यह है कि दोनों कार्यक्रमों का खर्च भी लगभग बराबर ही रहा है। साइकोथेरेपी प्रोग्राम में जहां हर मरीज के लिए 503 डॉलर का खर्चा आया। वहीं लाइफस्टाइल प्रोग्राम में हर मरीज पर बस 482 डॉलर ही खर्च हुए। ऐसे में प्रोफेसर एड्रिएन का मानना है कि यह स्टडी भविष्य में लाइफस्टाइल थेरेपी को बढ़ावा देने के लिए रास्ता खोलेगी। ऐसे में बढ़ते हुए मानसिक तनाव के मामलों के बीच मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों पर पड़ने वाला दबाव भी कम हो जाएगा।
