इन दिनों हम बहुत से बच्चों के कद छोटे, कमजोर और वजन कम होने की समस्या देखते हैं, जोकि एक गंभीर समस्या है। ऐसे में हाल ही में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने जून 2024 के महीने के पोषण ट्रैकर के आंकड़े लोकसभा में प्रस्तुत किए हैं। जिसमें बच्चों में बौनेपन, कम वजन और कमजोरी की चिंताजनक दरें उजागर हुईं। आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक बौनेपन का प्रतिशत 46.36 प्रतिशत दर्ज हुआ। वहीं लक्षद्वीप में कुपोषण का प्रतिशत सबसे अधिक है, जिसमें 13.22 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। इसके अलावा 0-5 वर्ष आयु वर्ग के 17 प्रतिशत बच्चे कम वजन के पाए गए, जबकि बौनेपन का प्रतिशत 36 प्रतिशत और कमजोरी का प्रतिशत 6 प्रतिशत रहा।

6 साल से कम आयु के बच्चों में बढ़ रहा है बौनेपन की समस्या  

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान बताया कि 6 साल से कम आयु के बच्चों में बौनेपन की प्रवृत्ति बढ़ रही है। लगभग 8.57 करोड़ बच्चों को पोषण ट्रैकर के जरिए ट्रैक किया गया। जिसमें सामने आया कि 35 प्रतिशत बच्चे बौने हैं। वहीं 17 प्रतिशत बच्चों का वजन कम मापा गया और 5 वर्ष से कम आयु के 6 प्रतिशत बच्चे कमजोर पाए गए। यह स्थिति चिंताजनक है और इसे जल्द ही संबोधित करने की आवश्यकता है।

बौने कमजोर और कम वजन होने की वजह

बौने कमजोर और कम वजन वाले बच्चों की संख्या बढ़ने के पीछे कुपोषण के कई कारण हो सकते हैं। कमजोर से मतलब उन बच्चों से है जो अपनी उम्र के हिसाब से बहुत छोटे हैं, जो आमतौर पर दीर्घकालिक कुपोषण के कारण होता है। वहीं कुछ बच्चे अपनी लंबाई के हिसाब से बहुत पतले हैं, जो अक्सर वजन कम होने के कारण तीव्र कुपोषण का संकेत देते हैं। कम वजन वाले बच्चों का वजन उनकी उम्र के हिसाब से कम होता है, जिसमें बौनापन और कमजोरी दोनों शामिल हैं। वहीं यह रिपोर्ट इस बात का संकेत देता है कि बच्चों को उचित पोषण और स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल रही हैं।

उत्तर प्रदेश में बौनेपन की दर अधिक

महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने राज्यवार आंकड़े प्रस्तुत किए। इन आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में बौनेपन की दर सबसे अधिक है, जहां 46.36 प्रतिशत बच्चे बौनापन के शिकार हैं। वहीं दूसरे स्थान पर लक्षद्वीप है, जहां 46.31 प्रतिशत बच्चे बौने हैं। महाराष्ट्र में 44.59 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 41.61 प्रतिशत की बौनेपन दर दर्ज हुई। मंत्री ने बताया कि कुपोषण की एक गंभीर निशानी, कमजोरी जो कि लक्षद्वीप में सबसे गंभीर स्थिति में है। यहां 13.22 प्रतिशत बच्चे कुपोषण से प्रभावित हैं। उधर बिहार में 9.81 प्रतिशत और गुजरात में 9.16 प्रतिशत की उच्च कमजोरी दर दर्ज हुई।

कम वजन वाले बच्चों की भी संख्या अधिक

कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत भी कुछ राज्यों में बहुत अधिक है। बता दें कि मध्य प्रदेश में सबसे अधिक 26.21 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले दर्ज किए गए। वहीं दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव 26.41 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर हैं। लक्षद्वीप तीसरे स्थान पर रहा, जहां 23.25 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले दर्ज हुए। यह स्थिति बच्चों के स्वास्थ्य और विकास के लिए बेहद हानिकारक है और इसे तुरंत सुधारने की आवश्यकता है।

कुछ राज्यों में बच्चों की हालत बेहतर

महिला एवं बाल विकास मंत्री ने बताया कि कुछ राज्य अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। गोवा में सबसे कम बौनेपन की दर 5.84 प्रतिशत, कमजोर 0.85 प्रतिशत और कम वजन वाले बच्चे 2.18 प्रतिशत दर्ज किए गए हैं। वहीं सिक्किम और लद्दाख में भी बाकी राज्यों की तुलना में कम कुपोषण दर दिखाई दी है। बता दें कि यह रिपोर्ट यह दर्शाता है कि सही नीतियों और कार्यक्रमों के माध्यम से कुपोषण को नियंत्रित किया जा सकता है।

इस गंभीर समस्या को दूर करने के उपाय

सरकार को इस गंभीर समस्या को प्राथमिकता के साथ संबोधित करने की आवश्यकता है। बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य के लिए व्यापक योजनाएं और कार्यक्रम लागू किए जाने चाहिए। इसके लिए जागरूकता अभियान, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, और पर्याप्त पोषण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है। इन प्रयासों से ही बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हो सकेगा और वे स्वस्थ एवं खुशहाल जीवन जी सकेंगे।

By tnm

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