अब हॉस्पिटल में इलाज के बाद मरीज से प्राप्त कोई भी सामग्री जैसे रक्त, मूत्र, ऊतक, अंग, लार, डीएनए/आरएनए, बाल, नाखून की कतरन, या कोई अन्य कोशिकाएं या तरल पदार्थों को बायोमेडिकल कचरे में नहीं फेंके जाएंगे। दरअसल हाल ही में भारत के केंद्र सरकार ने इन नमूनों पर कंपनियों को स्टडी करने की मंजूरी दे दी हैं, ताकि कंपनी इससे सस्ते इलाज की खोज कर सके।
क्यों दिया सरकार ने इस स्टडी की मंजूरी
बता दें कि ICMR यानी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा पहले ही 5 दिसंबर, 2023 को कमर्शियल पर्पस के लिए इन जैविक नमूनों पर रिसर्च के लिए एक गाइडलाइंस तैयार किया गया था। हालांकि इस गाइडललाइंस को 19 जून को यूनियन हेल्थ मिनिस्ट्री ने जारी किया है। यूनियन हेल्थ मिनिस्ट्री के मुताबिक अगर जांच या इलाज के दौरान जो भी ऑर्गैनिक वेस्ट इकट्ठे होते हैं उसे फेकने की बजाए कंपनियां इन वेस्ट से जीवाणुओं और एन्टीबायोटिक रोगियों की खोज के लिए उन्हें उपयोग करेंगी।
क्या है इस शोध का उद्देश्य
हालांकि ऑर्गैनिक वेस्ट से मिलने वाले जीवाणुओं और एन्टीबायोटिक रोगियों की खोज को बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने अभी तक कई स्टडीज और अनुसंधान किए हैं। इस प्रयास का मुख्य उद्देश्य यह है कि सस्ते और प्रभावी तरीके से इन वेस्ट को मैनेज किया जा सके और उनसे उपयुक्त लाभ प्राप्त किया जा सके।
ऐसे में अब भारतीय वैज्ञानिक समुदाय इस नई पहल के पक्ष में खड़ा हो रहा है और वे वेस्ट मैनेजमेंट में सुधार के लिए नए-नए तकनीकी उपायों का अध्ययन कर रहे हैं। इसके अलावा, सरकारी स्तर पर भी यह पहल प्रोत्साहनीय मानी जा रही है ताकि ऑर्गैनिक वेस्ट को मैनेज करने और स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए उपयुक्त हो सके।
विभिन्न निजी कंपनियां का योगदान
बता दें कि इस प्रक्रिया में सहयोग करने के लिए विभिन्न निजी कंपनियां भी आगे आ रही हैं और उन्हें सही संसाधन और समर्थन प्रदान किया जा रहा है। इस तरह की अविश्वसनीय इनोवेशन और प्रयास से सामाजिक और वैज्ञानिक समुदाय को लाभ पहुंचने की उम्मीद है और इससे वेस्ट मैनेजमेंट के क्षेत्र में नई दिशा मिल सकती है।
