नोएडा के सेक्टर-30 स्थित चाइल्ड पीजीआई में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने देश की पहली बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) यूनिट का उद्घाटन किया। इस यूनिट को चार करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया है, जिसमें आठ बेड उपलब्ध हैं। अब, प्रदेश के लोग, विशेषकर नोएडा और आसपास के क्षेत्रों के निवासी, बिना दिल्ली गए इलाज की सुविधा प्राप्त कर सकेंगे, जिससे इलाज सुलभ और सुविधाजनक हो जाएगा।
बोन मेरो ट्रांसप्लांट: एक जरूरी चिकित्सा प्रक्रिया
बोन मेरो ट्रांसप्लांट तब आवश्यक होता है जब बोन मेरो अपने कार्य को ठीक से नहीं कर पाता। यह स्थिति थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, ल्यूकेमिया जैसे गंभीर रोगों में उत्पन्न होती है। ट्रांसप्लांट के लिए रोगी और डोनर का बोन मेरो मेल खाना जरूरी होता है, विशेष रूप से एचएलए (Human Leukocyte Antigen) का मेल। सगे भाई-बहन में इस मेल की संभावना 25% होती है, जबकि माता-पिता से 1-3%।
कब किया जाता है बोन मेरो ट्रांसप्लांट?
बोन मेरो ट्रांसप्लांट उन बच्चों के लिए किया जाता है जो थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, ल्यूकेमिया या एप्लास्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित होते हैं। इन बीमारियों का इलाज कीमोथेरेपी से शुरू किया जाता है, और फिर डोनर से प्राप्त बोन मेरो को रोगी के शरीर में चढ़ाया जाता है। बच्चों में विशेष रूप से 10-12 वर्ष की उम्र में इस ट्रांसप्लांट की सफलता की दर 95% तक होती है, इसलिए डॉक्टर इस उम्र में ट्रांसप्लांट कराने की सलाह देते हैं।
बोन मेरो ट्रांसप्लांट का खर्च
बोन मेरो ट्रांसप्लांट का खर्च रोगी की स्थिति पर निर्भर करता है। थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसे मामलों में यह खर्च 10-12 लाख रुपये तक हो सकता है। हालांकि, कई सरकारी योजनाओं और स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से यह खर्च कम किया जा सकता है। मुख्यमंत्री योजना, प्रधानमंत्री योजना, महात्मा फुले योजना और शिल्पा कल्पतरु जैसी योजनाएं आर्थिक सहायता प्रदान करती हैं, जिससे गंभीर रोगों से जूझ रहे परिवारों को राहत मिलती है।
