भारत में शोर प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुकी है, खासकर शादी के मौसम में जब शादियों और अन्य आयोजनों के दौरान आवाज का स्तर आसमान छूने लगता है। यह शोर न केवल लोगों की मानसिक शांति को बिगाड़ रहा है, बल्कि स्वास्थ्य पर भी इसका गंभीर असर पड़ रहा है। हालांकि इस समस्या के खिलाफ आवाजें उठाई जाती हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से प्रभावी कदम उठाने में कमी दिखाई देती है।

शोर प्रदूषण से मौतें और हिंसा

देश भर में शोर प्रदूषण के कारण लोगों की जान भी जा चुकी है। छत्तीसगढ़ में एक व्यक्ति की मौत उस समय हुई जब उसने अत्यधिक शोर से परेशान होकर इसका विरोध किया। इसके अलावा 10 दिसंबर 2024 को भोपाल में एक दिहाड़ी मजदूर की हत्या कर दी गई क्योंकि उसने तेज शोर करने से कुछ लोगों को रोका था। इस प्रकार की घटनाएं दर्शाती हैं कि शोर से जुड़ी समस्या केवल मानसिक तनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंसा और मौत का कारण भी बन सकती है।

इंदौर पुलिस की सख्त कार्रवाई

इंदौर मध्य प्रदेश में शोर प्रदूषण के खिलाफ एक सख्त कदम उठाया गया है। पिछले एक माह से शहर की ट्रैफिक पुलिस बाइकर्स के खिलाफ कार्रवाई कर रही है जिन्होंने अपने बाइकों में मोडिफाइड साइलेंसर लगा रखे हैं, जिससे अत्यधिक शोर उत्पन्न होता है। अब तक पुलिस ने दो हजार से अधिक मोडिफाइड साइलेंसर को नष्ट कर दिया है। इन साइलेंसरों के कारण सड़कों पर तेज आवाज के साथ बाइकर्स दौड़ते हैं, जिससे अन्य वाहन चालकों के लिए खतरा उत्पन्न हो जाता है और कई बार दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं।

अन्य शहरों में भी शोर के खिलाफ कार्रवाई

ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ अन्य शहरों में भी कार्रवाई की जा रही है। दिल्ली में 2022 में प्रेशर हॉर्न, संशोधित साइलेंसर और अत्यधिक हॉर्न बजाने पर प्रतिबंध लगाया गया था। दिल्ली पुलिस नियमित रूप से ऐसे ड्राइवरों के खिलाफ विशेष अभियान चलाती है जो इन नियमों का उल्लंघन करते हैं। इसी तरह बेंगलुरु पुलिस ने 2022 में मस्जिदों, मंदिरों, चर्चों और अन्य संस्थानों को निर्धारित डेसिबल सीमा के भीतर लाउडस्पीकर का उपयोग करने की अधिसूचना जारी की थी।

यूपी में शोर प्रदूषण पर पुलिस की निष्क्रियता

हालांकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में शोर प्रदूषण के खिलाफ पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। राज्य के कानून प्रवर्तन अधिकारियों के पास शोर प्रदूषण की निगरानी और समाधान करने के लिए आवश्यक संसाधन और प्रशिक्षण की कमी है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में शोर प्रदूषण के मामले अपेक्षाकृत अधिक देखे जाते हैं।

बढ़ते शोर प्रदूषण के आंकड़े

भारत के विभिन्न शहरों में शोर का स्तर बेहद चिंताजनक स्थिति में है। 2023 में अर्थ 5आर संगठन द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में 15 भारतीय शहरों के आवासीय क्षेत्रों में शोर की स्थिति की जांच की गई। सर्वे में पाया गया कि शोर का स्तर 50 डेसिबल (डीबी) की निर्धारित सीमा से लगभग 50 प्रतिशत अधिक था। इस रिपोर्ट के अनुसार, शोर प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक हानिकारक हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार दिन में शोर का स्तर 65 डीबी से नीचे और रात के समय 30 डीबी से अधिक नहीं होना चाहिए।

शोर प्रदूषण का स्वास्थ्य पर प्रभाव

ध्वनि प्रदूषण का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 2018 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने यातायात शोर के स्तर को 53 डेसिबल तक सीमित करने का सुझाव दिया था। 45 डेसिबल से अधिक शोर नींद में खलल डालता है, जबकि 85 डेसिबल से ऊपर के शोर स्तर में लंबे समय तक रहना हानिकारक हो सकता है। उदाहरण के लिए कार के हॉर्न का शोर 90 डेसिबल और बस के हॉर्न का शोर 100 डेसिबल होता है।

दुनिया में भारत का स्थान

वैश्विक स्तर पर भी भारत के कई शहरों में शोर प्रदूषण का स्तर चिंता का कारण बन चुका है। मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश, दुनिया के पहले दस सबसे शोर वाले शहरों में से एक है। यहां शोर का स्तर 114 डेसिबल तक पहुंच जाता है। इस सूची में भारत का मुरादाबाद दूसरा और बांग्लादेश का ढाका पहले स्थान पर है।

भविष्य की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शोर प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो 2050 तक 2.5 अरब लोग सुनने की क्षमता खो सकते हैं। 2021 में 43.2 करोड़ वयस्क और 3.4 करोड़ बच्चे शोर प्रदूषण से प्रभावित पाए गए थे।

By tnm

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *