आजकल डायबिटीज एक आम बीमारी बन चुकी है, जो भारत में तेजी से बढ़ रही है। जबकि हम सभी टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज के बारे में जानते हैं, क्या आप जानते हैं कि इसके अलावा भी एक तीसरी प्रकार की डायबिटीज होती है, जिसे टाइप 1.5 डायबिटीज कहा जाता है? यह बीमारी टाइप 1 और टाइप 2 दोनों के लक्षणों को मिलाकर बनती है। हाल ही में एक मेडिकल जर्नल नेचर की रिपोर्ट के अनुसार यह बीमारी अब तेजी से फैल रही है और अधिक लोग इस शिकार हो रहे हैं।
टाइप 1.5 डायबिटीज क्या है
टाइप 1.5 डायबिटीज, जिसे लैटेंट ऑटोइम्यून डायबिटीज इन एडल्ट्स (LADA) या एडल्ट-ऑनसेट ऑटोइम्यून डायबिटीज (AAAD) भी कहा जाता है, वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति की आयु 30 वर्ष से अधिक होती है, लेकिन लक्षण बच्चों में होने वाली टाइप 1 डायबिटीज और वयस्कों में होने वाली टाइप 2 डायबिटीज दोनों के समान होते हैं। यह एक ऑटोइम्यून समस्या है, जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम पैंक्रियाज में इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं पर हमला करता है।
टाइप 1 और टाइप 2 में अंतर
टाइप 1 डायबिटीज
एक ऑटोइम्यून स्थिति है, जिसमें शरीर के इम्यून सिस्टम द्वारा पैंक्रियाज की इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नष्ट कर दिया जाता है। इसका इलाज जीवनभर इंसुलिन द्वारा किया जाता है और यह आमतौर पर बच्चों और किशोरों में पाया जाता है।
टाइप 2 डायबिटीज
मुख्य रूप से लाइफस्टाइल और खानपान से जुड़ी बीमारी है। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता या पैंक्रियाज सही मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। यह स्थिति अधिकतर वयस्कों, खासकर मोटापे से प्रभावित लोगों में पाई जाती है।
टाइप 1.5 डायबिटीज कैसे है अलग
टाइप 1.5 डायबिटीज में टाइप 1 और टाइप 2 दोनों के लक्षण होते हैं। इस बीमारी में टाइप 1 के जैसा ऑटोइम्यून असर होता है, जिसमें पैंक्रियाज की इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं पर हमला किया जाता है, लेकिन यह स्थिति धीरे-धीरे विकसित होती है। शुरुआत में इंसुलिन की आवश्यकता नहीं होती, और आमतौर पर यह 30 साल से अधिक उम्र के व्यक्तियों में होती है। यह टाइप 2 की तरह मोटापे और लाइफस्टाइल से भी जुड़ी हो सकती है, हालांकि इसका कारण अधिक जटिल होता है।
टाइप 1.5 डायबिटीज के लक्षण
अत्यधिक प्यास लगना
बार-बार पेशाब आना
थकान का एहसास
धुंधला दिखना
वजन का अचानक कम होना
टाइप 1.5 डायबिटीज का इलाज
इस बीमारी के इलाज में पहले दवाओं का उपयोग किया जाता है, जो ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। यदि स्थिति गंभीर हो जाती है, तो इंसुलिन के इंजेक्शन्स की आवश्यकता भी हो सकती है। शुरुआत में यह दवाइयां और कुछ मामलों में इंसुलिन थेरेपी से रोग को नियंत्रित किया जा सकता है।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी केवल जागरूकता के लिए है और किसी भी चिकित्सा सलाह का विकल्प नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए हमेशा विशेषज्ञ से सलाह लें।
