महिलाओं का शरीर कुदरती तौर पर एक खास जैविक चक्र से गुजरता है, जिसे मासिक धर्म या पीरियड्स कहा जाता है। पीरियड्स के दौरान महिलाओं को न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और भावनात्मक तनाव का भी सामना करना पड़ता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब किसी महिला एथलीट को किसी महत्वपूर्ण खेल के दौरान पीरियड्स हो जाएं, तो इसका उनके शरीर और प्रदर्शन पर क्या असर पड़ सकता है? यह जानना महत्वपूर्ण है कि यह स्थिति किसी भी महिला एथलीट के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है।

पीरियड्स के कारण मैरी कॉम ने गंवाया सिल्वर

भारत की मशहूर बॉक्सर मैरी कॉम 2012 के लंदन ओलंपिक में सिल्वर मेडल से चूक गईं। लंदन ओलंपिक के 51 किलोग्राम वर्ग में सेमीफाइनल में पहुंचने वाली मैरी कॉम से देश को कम से कम सिल्वर मेडल की उम्मीद थी। हालांकि, सेमीफाइनल मैच से एक दिन पहले ही उन्हें पीरियड्स आ गया, और दर्द और क्रैंप के कारण उनका शरीर कमजोर हो गया। परिणामस्वरूप उनका खेल प्रभावित हुआ, और वह निकोला एडम्स के खिलाफ मुकाबला हार गईं। ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट के स्पोर्ट्स साइंस प्रमुख डॉ. निखिल लेटली ने बताया कि पीरियड्स आने से महिला के शरीर में कमजोरी और आलस्य बढ़ जाता है, जिससे मांसपेशियां ढीली पड़ने लगती हैं, और इसका सीधा असर प्रदर्शन पर पड़ता है। मैरी कॉम को ब्रॉन्ज मेडल से ही संतोष करना पड़ा।

हाल ही में 2024 ओलंपिक में वेटलिफ्टर मीराबाई चानू भी 49 किलोग्राम भार वर्ग में चौथे स्थान पर रहीं, और उन्होंने भी पीरियड्स को अपने प्रदर्शन में कमी का प्रमुख कारण बताया।

पीरियड्स क्यों आते हैं

पीरियड्स महिलाओं के शरीर का एक जैविक चक्र है, जिसमें हर महीने महिला का शरीर मातृत्व के लिए तैयार होता है। जब गर्भधारण नहीं होता, तो यह चक्र टूट जाता है और गर्भाशय की दीवार से बना रक्त और अन्य पदार्थ शरीर से बाहर निकलते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक मासिक धर्म महिला की प्रजनन प्रणाली को नियमित रखने के लिए आता है, और यह चक्र 11 से 14 साल की उम्र से शुरू होकर 45 से 55 साल तक चलता है।

मासिक धर्म के दौरान गर्भाशय की दीवार, जिसे एंडोमैटेरियम कहते हैं, मोटी होती जाती है, और जब अंडाशय से अंडा गर्भाशय में नहीं मिलता, तो यह दीवार टूट जाती है। इस प्रक्रिया के दौरान नसों से जुड़े होने के कारण शरीर में दर्द और क्रैंप होते हैं। मांसपेशियों की कमजोरी और पेट दर्द के साथ-साथ कुछ महिलाओं को उल्टी, चक्कर, डायरिया, और लूज मोशन जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है।

पीरियड की चार अवस्थाएं

पीरियड फेज

जब गर्भाशय की लाइनिंग और रक्त बाहर निकलता है, इसे पीरियड फेज कहते हैं। यह 3 से 7 दिनों तक चलता है।

फॉलिकुलर फेज

यह पीरियड के बाद शुरू होता है और 13 से 14 दिनों तक चलता है। इस दौरान गर्भाशय की दीवार मोटी होने लगती है और अंडाशय में अंडे का विकास होता है।

ऑव्यूलेशन फेज

इस दौरान अंडा अंडाशय से निकलकर गर्भाशय की ओर जाता है, जहां यह स्पर्म से मिलने का इंतजार करता है।

ल्यूटियल फेज

अगर अंडा स्पर्म से नहीं मिलता, तो गर्भाशय की दीवार टूटने लगती है, और पीरियड फेज में यह प्रक्रिया फिर से शुरू हो जाती है।

पीरियड्स का महिला एथलीटों पर असर

पीरियड्स के दौरान शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जो मांसपेशियों को कमजोर कर देते हैं। आलस्य बढ़ता है, और पेट में दर्द या क्रैंप के कारण खेल के दौरान फोकस बनाए रखना कठिन हो जाता है। पीरियड्स से पहले और इसके दौरान मांसपेशियों में कमजोरी, आलस्य, और शारीरिक दर्द के कारण किसी भी महिला एथलीट के प्रदर्शन पर असर पड़ना स्वाभाविक है।

महिला एथलीट्स पीरियड्स को कैसे मैनेज कर सकती हैं

भारत की पूर्व ओलंपिक स्विमर निशा मिलर के अनुसार, गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल कर एथलीट अपने पीरियड्स को नियंत्रित कर सकती हैं। यह गोलियां ओव्यूलेशन को रोकने का काम करती हैं, जिससे पीरियड्स कुछ दिनों के लिए टल जाते हैं। हालांकि, यह सिर्फ डॉक्टर की निगरानी में ही किया जाना चाहिए। निशा ने सलाह दी कि डॉक्टर ही यह तय कर सकते हैं कि किसी महिला एथलीट को इन गोलियों की जरूरत है या नहीं। इससे पीरियड्स की तारीख को थोड़े समय के लिए टाला जा सकता है, जिससे एथलीट महत्वपूर्ण खेल के समय इस असहनीय दर्द से बच सकती हैं।

By tnm

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