भारत में ऑफिस और फैक्ट्रियों में काम के अत्यधिक दबाव के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। हाल ही में पुणे की 26 वर्षीय अन्ना सेबेस्टियन पेरायिल और लखनऊ के एचडीएफसी बैंक में कार्यरत 45 वर्षीय सदफ फातिमा की अचानक हुई मौतों ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है। दोनों घटनाओं ने वर्कलोड और ऑक्यूपेशनल डेथ से जुड़े कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में ऑफिस में बढ़ता वर्कलोड कम करने के लिए जापान ने कानून बनाया है। वहीं अब देखना है कि भारत इस समस्या को हल करने के लिए क्या कदम उठाएगी। चलिए इसके बारे में जानते हैं।

अधिक काम के दबाव से हो रही मौतें

अन्ना की मां ने बेटी की मौत के लिए वर्क कल्चर को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि अन्ना पर काम का इतना दबाव था कि उसकी भूख-प्यास तक खत्म हो गई थी, और नींद न आने के कारण उसकी मौत हुई। दूसरी तरफ सदफ फातिमा की मौत भी काम के अत्यधिक दबाव के बीच हो गई, जब वह अपनी कुर्सी से अचानक गिर पड़ीं और फिर उठ नहीं पाईं।

इन दोनों घटनाओं ने भारत में वर्कलोड के बढ़ते प्रभाव और इसके कारण होने वाली मौतों की गंभीरता पर सवाल उठाए हैं। भारत में इस तरह की घटनाओं में लगातार वृद्धि देखी जा रही है, जहां युवाओं की मौतें काम के अधिक बोझ और तनाव के कारण हो रही हैं। इसे ऑक्यूपेशनल डेथ के रूप में जाना जाता है।

विशेषज्ञों की राय

लंदन से ऑक्यूपेशनल मेडिसिन की पढ़ाई कर चुके डॉ. टी. के. जोशी ने इन मौतों को वर्क रिलेटेड डेथ बताते हुए कहा कि यह ऑक्यूपेशनल डेथ के तहत आती हैं और इन मामलों में मुआवजा मिलना चाहिए। उनका मानना है कि आने वाले समय में भारत में इस तरह की घटनाओं में वृद्धि हो सकती है, और इस समस्या से निपटने के लिए तुरंत कानून बनाना जरूरी है।

जापान का अनुभव

डॉ. जोशी ने बताया कि दुनिया में पहली बार इस तरह की मौत का मामला जापान में 1969 में सामने आया था, जब एक 29 वर्षीय व्यक्ति अत्यधिक काम के कारण मर गया था। इसके बाद जापान में करोशी एक्ट नामक कानून लाया गया, जिसमें वर्क रिलेटेड डेथ के लिए गाइडलाइंस बनाई गईं। 2018 के बाद से जापान में ओवरटाइम के घंटे सीमित कर दिए गए हैं, जहां एक वर्कर महीने में 45 घंटे से अधिक और साल में 360 घंटे तक ही ओवरटाइम कर सकता है।

भारत में ऑक्यूपेशनल हेल्थ और सुरक्षा नियम

भारत में श्रम मंत्रालय के तहत आने वाली कंपनियों और फैक्ट्रियों के लिए गाइडलाइंस हैं कि जहां 500 से अधिक कर्मचारी हों, वहां एक ऑक्यूपेशनल हेल्थ सेंटर होना चाहिए। इसमें एक डॉक्टर, एक सेफ्टी ऑफिसर, और एक ऑक्यूपेशनल हाईजिनिस्ट शामिल होना चाहिए। इसका उद्देश्य कर्मचारियों की स्वास्थ्य समस्याओं को तुरंत पहचानना और उनका इलाज करना है।

हालांकि वास्तविकता यह है कि केवल 5 प्रतिशत कंपनियों में ही ऐसे सेंटर मौजूद हैं। इससे यह सवाल उठता है कि कितने डॉक्टर और सेफ्टी ऑफिसर इस तरह की स्थितियों से निपटने के लिए प्रशिक्षित होते हैं? सरकार वर्क रिलेटेड मौतों जैसे ब्रेन हेमरेज, हार्ट अटैक, इम्यूनिटी की कमी, और नींद की समस्याओं से निपटने के लिए कितना काम कर रही है?

क्या भारत में लागू होगा करोशी एक्ट

जापान की तरह भारत में भी करोशी एक्ट लागू करने की मांग उठने लगी है। अगर यह कानून लागू होता है, तो इससे कर्मचारियों के लिए सुरक्षा नॉर्म्स और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दिया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भारत में वर्कलोड के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा और बढ़ सकता है, जिससे युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।

इसलिए यह समय है कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान दे और आवश्यक कदम उठाए, ताकि कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और ऑक्यूपेशनल डेथ जैसी घटनाओं को रोका जा सके।

By tnm

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *