काम का दबाव आजकल हर किसी के जीवन का हिस्सा बन गया है। चाहे वह युवा हो या वयस्क, कार्यस्थल पर तनाव और बढ़ती जिम्मेदारियों का असर अब केवल मानसिक नहीं बल्कि शारीरिक सेहत पर भी पड़ने लगा है। पहले समय में ऑफिस का काम बस ऑफिस तक ही सीमित रहता था, लेकिन कोरोना महामारी के बाद वर्क-फ्रॉम-होम और हाइब्रिड वर्किंग के बढ़ते चलन ने घर और ऑफिस के बीच की सीमाओं को धुंधला कर दिया है। ऐसे में वर्कलोड न केवल बढ़ा है बल्कि उसने लोगों की निजी जिंदगी को भी बुरी तरह प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
काम का दबाव और उसके प्रभाव
आजकल पुरुष और महिलाएं दोनों ही अत्यधिक कार्यदबाव का सामना कर रहे हैं। दफ्तर में 9 घंटे की तनावपूर्ण टाइमिंग, बॉस का दबाव, मैनेजमेंट की मुश्किलें, समय-सीमा की टाइट डेडलाइन्स और क्लाइंट्स की बढ़ती मांगें तनाव को बढ़ावा देती हैं। इन कारणों से न केवल मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है, बल्कि शरीर भी थकान, अनिद्रा, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और दिल की बीमारियों का शिकार होने लगता है।
क्या है स्टडी
बेंगलुरु की एक हेल्थकेयर कंपनी द्वारा किए गए एक हालिया सर्वे में पाया गया कि 21 से 30 साल के बीच के कर्मचारी सबसे ज्यादा तनावग्रस्त रहते हैं। इस सर्वे में आईटी, मैन्युफैक्चरिंग, परिवहन, मीडिया, कानूनी सेवाओं और अन्य क्षेत्रों के 5000 से अधिक कर्मचारियों ने हिस्सा लिया। सर्वे के अनुसार महिलाओं में तनाव का स्तर पुरुषों की तुलना में अधिक होता है। लगभग 72% महिलाएं कार्यस्थल पर हाई टेंशन का अनुभव करती हैं, जबकि 53% पुरुषों ने ऐसा अनुभव किया।
महिलाओं पर ज्यादा दबाव
महिला कर्मचारियों ने अपने काम और निजी जीवन में संतुलन की कमी, पहचान की कमी, कम मनोबल और आलोचना के डर को तनाव बढ़ने के प्रमुख कारणों में गिनाया। पिछले कुछ सालों में उच्च और अत्यधिक तनाव के स्तर से पीड़ित कर्मचारियों की संख्या में 31% की वृद्धि देखी गई है।
शोध में सामने आए परिणाम
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की वर्क एंड वेल विंग द्वारा किए गए एक अन्य शोध में पाया गया कि अत्यधिक तनाव लेने से दिमाग की नसें सिकुड़ने लगती हैं, जिससे नर्वस सिस्टम पर बुरा असर पड़ता है। अगर कार्यस्थल पर आपके साथ गलत व्यवहार होता है या कोई शोषण होता है, तो इससे कोर्टिसोल हार्मोन में बदलाव आता है, जो मानसिक बीमारियों जैसे डिमेंशिया या अल्जाइमर का कारण बन सकता है।
तनाव से निपटने के तरीके
दफ्तर में किस स्थिति से तनाव बढ़ रहा है, उसकी पहचान करना जरूरी है। इसके लिए आप रोजाना अपने दिनभर के अनुभवों को डायरी में लिख सकते हैं। एक बार तनाव का कारण पता चल जाए तो उसे सकारात्मक तरीके से सुलझाने की कोशिश करें। उदाहरण के लिए अगर किसी सहकर्मी से विवाद होता है, तो अगली बार उससे शांति से बात कर समाधान निकालें।
काम के बीच ब्रेक लें
काम के बीच में ब्रेक लेना भी जरूरी है। इससे मानसिक और शारीरिक ऊर्जा बनी रहती है। साथ ही कामकाजी और निजी जीवन में संतुलन बनाने के लिए समय का प्रबंधन और मेडिटेशन भी मददगार हो सकता है। पौष्टिक आहार और नियमित व्यायाम से भी तनाव को नियंत्रित रखा जा सकता है।
विशेषज्ञ की राय
एक्सपर्ट्स के मुताबिक कार्यस्थल का तनाव लंबे समय तक बना रहने से दिमाग में रासायनिक असंतुलन हो सकता है, जिससे अवसाद और चिंता जैसी मानसिक समस्याएं हो सकती हैं। लंबे समय तक तनाव से याद करने और निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
वर्कलोड और तनाव से निपटने के लिए समय रहते सही कदम उठाना जरूरी है, ताकि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान से बचा जा सके।
