एक तरफ जहां अभी लोग वैक्‍सीन कोविशील्‍ड के साइड इफैक्‍ट्स से परेशान हैं वहीं अब कोवैक्‍सीन के साइड इफैक्‍ट्स पर आई एक रिसर्च ने लोगों में सनसनी मचा दी है। दरअसल कोविड-19 के समय सभी लोगों ने कोरोना से बचने के लिए दोनों ही वैक्सीन लगवाए थे, जबकि कुछ लोगों ने तो उस दौरान प्रयोग के लिए दिए गए कोवैक्‍सीन और कोविशील्‍ड का कॉकटेल डोज भी लगवाया था। ऐसे में अब इससे होने वाले साइड इफेक्टस को लेकर लोग काफी डरे हुए हैं।

वही कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि इन दोनों वैक्सीन में सबसे ज्यादा साइड इफेक्टस किस वैक्सीन से है। किस वैक्सीन से सबसे ज्यादा खतरा है। ऐसे में इन सवालों उठे सलावों का जवाब देने के लिए जाने माने वायरोलॉजिस्‍ट और डॉ. अंबेडकर सेंटर फॉर बायोमेडिकल रिसर्च नई दिल्‍ली के डायरेक्‍टर प्रोफेसर सुनीत के सिंह ने अपनी राय दी है। आइए जानते हैं इन दोनों वैक्सीन को लेकर उन्होंने क्या बताया है।  

जानिए दोनों में से किसके साइड इफैक्‍ट्स हैं खतरनाक

कोविशील्‍ड वैक्सीन के साइड इफेक्टस के प्रभाव

डॉ. सुनीत सिं‍ह ने बताया कि कोविशील्‍ड और कोवैक्‍सीन के साइड इफैक्‍ट्स जिस तरह पूरी तरह अलग हैं, वैसे ही इनका निर्माण भी अलग पद्धतियों से हुआ है। पहले कोविशील्‍ड की बात करें तो यह एडिनोवायरस बेस्‍ड वैक्‍सीन थी, जो बायोटेक्‍नोलॉजी का नया टर्म है। इसमें एक्टिव स्‍पाइक प्रोटीन को वैक्‍सीन के माध्‍यम से शरीर में डाला जाता है और तब सार्स कोव 2 के खिलाफ एंटीबॉडीज बनती हैं।

इसमें साइड इफैक्‍ट्स की संभावना अन्‍य वैक्‍सीन की तरह ही है लेकिन उससे भी ज्‍यादा एस्‍ट्रेजेनेका कंपनी ने ही इसके साइड इफैक्‍ट्स को खुद स्‍वीकार कर लिया है। हालांकि फिर भी वैज्ञानिक के पॉइंट ऑफ व्यू से और भारत के Perspective में देखा जाए तो जितने लोग वैक्‍सीनेटेड हुए हैं उसके हिसाब से एस्‍ट्रेजेनेका के डेटा के मुताबिक लाइफ थ्रेटनिंग थ्राम्‍बोसिस वाले मरीजों की संख्‍या बहुत कम थी। अब जबकि कोविशील्‍ड को लगे इतना समय निकल गया है भारत के लोगों को इसका खतरा नहीं है। बाकी अपवाद किसी भी दवा में हो सकता है।

कोवैक्‍सीन के प्रभाव

कोवैक्‍सीन को लेकर डॉ. सुनीत  ने बताया कि मेडिकली इसके जो भी साइड इफैक्‍ट्स बताए गए हैं वे लांग कोविड के साइड इफैक्‍ट्स ज्‍यादा दिखाई दे रहे हैं। कोवैक्‍सीन को लेकर दो पहलू हैं। पहला ये कि जिस तकनीक से यह बनाई गई है, उस तकनीक से बनाई गई कई वैक्‍सीन भारत में आज भी बच्‍चों और बड़ों को लगाई जा रही हैं।

यह एक इनएक्टिवेटेड वैक्‍सीन है। इसमें मृत वायरस को शरीर के अंदर पहुंचाया जाता है जो संक्रमण करने में असमर्थ रहता है लेकिन उसके एंटीजन शरीर को रोग के प्रति एंटीबॉडीज बनाने के लिए प्रेरित करते हैं और बीमारी से बचाव करते हैं। ऐसे में वायरस पर बनी ये वैक्‍सीन है तो इससे कोरोना या ऐसे किसी संक्रमण होने का खतरा नहीं होता है। वहीं दूसरा वैज्ञानिक पहलू है कि जब कोवैक्‍सीन लोगों को लगाई गई तो क्‍या गारंटी है कि इसके बाद लोगों को ओमिक्रोन या कोरोना जेएन.1 जैसे वेरिएंट से संक्रमण नहीं हुआ होगा।

जबकि भारत की बहुत बड़ी आबादी वैक्‍सीन लेने के बाद भी संक्रमित हुई, क्‍योंकि ये सभी वैक्‍सीन संक्रमण को नहीं रोकतीं, फैटलिटी को रोकती हैं। वहीं संक्रमण तो वैक्‍सीन के बाद भी हो सकता है। आगे उन्होंने बताया कि क्‍या गारंटी है कि जो भी साइड इफैक्‍ट्स रिसर्च स्‍टडी में सामने आए हैं वे वैक्‍सीन के ही हैं, कोमोरबिड कंडीशन या सार्स कोव के बार बार संक्रमण की वजह से लांग कोविड के नहीं हैं।

क्‍या ऐसा कोई रिकॉर्ड है कि जो लोग रिसर्च में शामिल हुए उन्‍हें वैक्‍सीन के बाद कोरोना नहीं हुआ। जहां तक कोवैक्‍सीन के साइड इफैक्‍ट्स की बात है तो ये लांग कोविड के इफैक्‍ट्स की तरह हैं। ये गंभीर नहीं हैं लेकिन कोई भी बीमारी कभी भी गंभीर हो सकती है और यह लोगों की लाइफ क्‍वालिटी पर निर्भर करता है। ऐसे में दोनों वैक्सीन से घबराने की जरूरत नहीं है।

By tnm

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