वर्तमान में मेडिकल की दुनिया में लोगों को बेहतर इलाज देने के लिए वैज्ञानिक काफी शोध कर रहे हैं। ऐसे में हाल ही में एनीमिया की जांच के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। बात दें कि भारतीय वैज्ञानिकों ने एक नॉन इनवेसिव हीमोग्लोबिन स्क्रीनिंग डिवाइस तैयार की है, जो किसी भी व्यक्ति में हीमोग्लोबिन का स्तर पता लगाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है, बिना ब्लड सैंपल लिए। यह उपकरण एनीमिया की जांच में क्रांति ला सकता है, क्योंकि पारंपरिक तरीके में व्यक्ति से रक्त लेने की आवश्यकता होती है। आमतौर पर सीरिंज के जरिये 3 से 10 एमएल तक रक्त लिया जाता है, जिसे फिर लैब में जांच के लिए भेजा जाता है। इस प्रक्रिया में रक्त, समय और बजट की काफी खपत होती है, साथ ही मेडिकल वेस्ट भी उत्पन्न होता है।
महिलाओं में एनीमिया की दिक्कत अधिक
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में एनीमिया की समस्या व्यापक रूप से पाई जाती है। खासकर भारत की महिलाओं में एनीमिया की समस्या काफी पाई जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक पुरुषों (15-49 वर्ष) में एनीमिया की व्यापकता 25.0 फीसदी है, जबकि महिलाओं (15-49 वर्ष) में यह 57.0 फीसदी है। किशोरों (15-19 वर्ष) में यह आंकड़ा 31.1 फीसदी और किशोरियों में 59.1 फीसदी है। इसके अलावा 15 से 49 वर्ष तक की 52.2 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। छह से 59 माह तक के लगभग 67.1 फीसदी बच्चे भी एनीमिया की चपेट में हैं।
24 लाख से अधिक लोगों की हुई जांच
आईसीएमआर ने इस डिवाइस को लोगों तक पहुंचाने के लिए बॉश और इजेआरएक्स कंपनी के साथ साझेदारी की है। इन कंपनियों ने अब तक 24 लाख से अधिक लोगों में एनीमिया की जांच की है, जिसके परिणामस्वरूप 6,075 यूनिट खून की बचत हुई है। जांच किए गए लोगों में 16.28 लाख महिलाएं और 8.20 लाख पुरुष शामिल हैं। इस डिवाइस के इस्तेमाल से 46 टन कार्बन उत्सर्जन कम होने का दावा भी किया गया है।
एनीमिया जांच के लिए ये डिवाइस उपयोगी
नॉन इनवेसिव हीमोग्लोबिन स्क्रीनिंग डिवाइस का विकास और इसका व्यापक इस्तेमाल एनीमिया की पहचान और उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस डिवाइस का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे रक्त की आवश्यकता नहीं होती, जिससे प्रक्रिया आसान और कम दर्दनाक हो जाती है। इसके अलावा इस उपकरण का उपयोग पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी लाभकारी है, क्योंकि इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है। इस प्रकार यह डिवाइस स्वास्थ्य क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो भविष्य में बड़े पैमाने पर प्रभाव डाल सकता है।
