बीते कुछ दिनों में पूरी दुनिया में कोविड-19 की वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स को लेकर खूब चर्चा हुई हैं। ऐसे में अब विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने कोरोना के दौरान दी गई एंटीबायोटिक्स दवाओं के ओवरडोज को लेकर चिंता जताई है। हाल ही में डब्ल्यूएचओ के द्वारा किये गए एक नए स्टडी में पाया गया है कि कोविड ट्रीटमेंट में दी गई एंटीबायोटिक्स ने सुपरबग यानि एंटिबाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) को तेजी से फैलाने का काम करता है। एंटीबायोटिक्स शरीर को बीमारियों से बचाने का काम करता है लेकिन इनके ओवरडोज़ होने पर शरीर रिस्पॉंस करना बंद कर देता है।
क्या है सुपरबग यानी AMR
बता दें कि AMR एक प्रतिकूल क्षमता है जो शरीर में ज्यादा मात्रा में एंटीबायोटिक्स जाने से पैदा होती है। इससे एक समय के बाद शरीर पर एंटीबयोटिक दवाओं का असर कम होने लगता है। वहीं हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि बिना जरूरत केएंटीबायोटिक्स देने से फायदे की जगह नुकसान होता है।
जानें क्या है WHO की पूरी स्टडी
WHO की ओर से 2020 से 2023 के बीच करीब 65 देशों में कोविड की वजह से भर्ती हुए करबी साढ़े चार लाख लोगों पर यह स्टडी किया गया था। इस स्टडी में डबल्यूएचओ ने पाया कि जितने लोग कोरोना की वजह से अस्पतालों में भर्ती हुए थे उनमें से सिर्फ 8 प्रतिशत मरीजों को बैक्टीरियल इंफेक्शन हुआ था। ऐसे में उन लोगों को एंटीबायोटिक्स की जरूरत थी। वहीं सावधानी की वजह से 75 प्रतिशत मरीजों को एंटीबायोटिक दवाएं ऐसे ही दे दी गईं थी। जिनमें सबसे ज्यादा एंटीबायोटिक उन मरीजों को दी गईं जिनमें कोविड के लक्षण बहुत ज्यादा थे। हालांकि मीडियम और कम लक्षण वाले लोगों को भी एंटीबायोटिक दवाएं दी गई थीं।
सुपरबग है सबसे बड़ा रिस्क
WHO के मुतबिक आने वाले सालों में सुपरबग यानि जब शरीर पर एंटीबायोटिक दवाएं असर करना बंद कर देंगी सबसे बड़ा खतरा पैदा होगा। वहीं 2019 की आकड़ों के मुताबिक सुपरबग की वजह से करीब 12.7 लाख लोगों की जान गई और ये सिलसिला यू ही चलता रहा तो 2050 तक हर साल 1 करोड़ लोगों को जान गंवानी पड़ सकती है।
