आजकल के बदलते दौड़ में अधिकांश लोग कैंसर की बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। वहीं कई मरीज इलाज के जरिए ठीक भी हो रहे हैं। लेकिन क्या कभी आपने यह सुना है कि कोई नवजात बच्चा ब्लड कैंसर से पीड़ित है। दरअसल हाल ही में छत्तीसगढ़ दुर्ग जिले के एक गांव में जन्मा नवजात ब्लड कैंसर से पीड़ित पाया गया है। इस दुर्लभ मामले में बच्चे के पीडियाट्रिशन ने बताया कि यह बीमारी दस लाख नवजातों में से किसी एक को होती है। एक से दस साल के बच्चों में ल्यूकेमिया के मामले काफी आम होते हैं, लेकिन नवजातों में यह बीमारी रेयर ऑफ रेयरेस्ट है।
कैसे पता चला बीमारी का
बता दें कि जन्म से ही नवजात मां का दूध नहीं पी रहा था, जिससे उसकी स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ती जा रही थी। उसे छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा सरकारी अम्बेडकर अस्पताल ले जाया गया और वहां उसकी सीबीसी (Complete Blood Count) जांच कराई गई। जांच के परिणाम चौंकाने वाले थे। दरअसल बच्चे के व्हाइट ब्लड सेल (RBC) की संख्या एक लाख थी, जबकि सामान्य बच्चों में यह संख्या 12 से 18 हजार के बीच होती है। बायोप्सी की रिपोर्ट में भी ब्लड कैंसर की पुष्टि हुई।
ल्यूकेमिया के लक्षण
श्वेत रक्त कणों की संख्या बढ़ना
थकान और खून की कमी
मुंह में छाले पड़ना
यूरीनरी संक्रमण
बुखार और पसीना आना
हड्डी में दर्द
सूजे हुए कोमल मसूड़े
त्वचा पर चकत्ते,
सिरदर्द
नजर कमजोर होना
बढ़े हुए लिम्फ नोड्स
पेट व छाती में दर्द या बेचैनी होना
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन लक्षणों की पहचान करना मुश्किल हो सकता है, खासकर नवजातों में।
इलाज और देखभाल
वहीं बच्चे को कीमोथैरेपी और रेडिएशन दिया जा रहा है। हालांकि नवजातों में ल्यूकेमिया के मामले बेहद दुर्लभ हैं, लेकिन एक से दस साल के बच्चों में यह बीमारी काफी आम है। इलाज से बच्चों के जीवन को बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए समय पर निदान और इलाज जरूरी है।
विशेज्ञ की राय
पीडियाट्रिशन का कहना है कि वे अब तक ऐसे महज दो केस देखे हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि बच्चों को इन्फेक्शन या ब्रेस्ट फीडिंग न कर पाने पर डॉक्टर को अवश्य दिखाएं।इस मामले में भी अगर बच्चे की हालत पर जल्द ध्यान न दिया जाता तो यह बीमारी और अधिक गंभीर हो सकती थी।
जागरूकता की जरूरत
ल्यूकेमिया जैसी गंभीर बीमारियों के प्रति जागरूकता बेहद जरूरी है। माता-पिता को बच्चों के स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखनी चाहिए और किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। शुरुआती लक्षणों की पहचान और तुरंत इलाज से बच्चों की जान बचाई जा सकती है। वहीं यह मामला न केवल दुर्लभ है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि बच्चों की स्वास्थ्य देखभाल में सजगता और सतर्कता कितनी महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में समय पर निदान और इलाज ही बच्चे के जीवन को बचा सकता है।
