डिमेंशिया एक ऐसी मासिक बीमारी है जिसमें व्यक्ति को सोचने, समझने और याद रखने की क्षमता कम होने लगती है। हालांकि ये बीमारी अक्सर उम्र के बढ़ने के साथ शुरू होती है। लेकिन आज की खराब लाइफस्टाइल और खानपीन की वजह से आज की युवाओं में भी यह प्रॉब्लम देखा जा सकता है। ऐसे में इसे लेकर यूके के शोधकर्ताओं ने एक नया टेस्ट विकसित किया है। जिसकी मदद से डिमेंशिया होने का कारण नौ साल पहले ही पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। वहीं इसे दुनिया भर में काफी लाभकारी बताया जा रहा है। क्योंकि आज के समय में पूरे विश्व में 55 मिलियन से अधिक लोग इस बीमारी के चपेट में हैं। चलिए इस स्टडी एक बारे में जानते हैं।
आखिर क्या है यह टेस्ट
क्वींस मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के शोधकर्ताओं के मुताबिक इस नए टेस्ट का यूज नॉर्मली इस्तेमाल होने वाले याद्दाश्त परीक्षणों या दिमाग के सिकुड़ने के मापन की तुलना में 80 प्रतिशत अधिक सटीक है। बता दें कि यह टेस्ट Functional MRI स्कैन पर बेस्ड है जो दिमाग के DMN यानी डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क में होने वाले बदलाव का पता लगाना है। हालांकि यह दिमाग के अलग-अलग क्षेत्रों को विशेष कॉग्निटिव के रूप में काम करता है। वहीं DMN वह पहला न्यूरल नेटवर्क है जो अल्जाइमर की बीमारी से प्रभावित होता है।
क्या है स्टडी
जर्नल नेचर मेंटल हेल्थ में पब्लिश रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ताओं ने 1,100 से अधिक लोगों पर fMRI स्कैन का उपयोग करके डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क के दस क्षेत्रों के बीच प्रभावी कनेक्टिविटी का अनुमान लगाया। बता दें कि इस रिपोर्ट में नए परीक्षण के जरिए डिमेंशिया के निदान से नौ साल पहले इसके बारे में सही और सटीक रूप से पता लगाया जा सकता है। वहीं जिन लोगों पर इसका परीक्षण किया गया है वे डिमेंशिया से प्रभावती थे, जिनमें ये परीक्षण सफल रहा है। साथ ही इस रिपोर्ट में अल्जाइमर के लिए आनुवंशिक जोखिम DMN में कनेक्टिविटी बदलाव के साथ जोड़ा गया है। इतना ही नहीं सामाजिक अलगाव भी DMN में कनेक्टिविटी को प्रभावित कर सकता है।
