हम सब यह बात तो जानते हैं कि ऑस्टियोपोरोसिस में शरीर की हड्डियां कमजोर और नाजुक हो जाती हैं जिससे हल्के सी चोट भी आपके लिए फ्रैक्चर का कारण बनेगी। खासकर महिलाओं में मेनोपॉज के बाद ऑस्टियोपोरोसिस होने का खतरा बढ़ जाता है। मेनोपॉज के दौरान या बाद में महिलाओं को होने वाली ऑस्टियोपोरोसिस बीमारी को ही पोस्ट-मेनोपॉजल ऑस्टियोपोरोसिस (पीएमओ) कहते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, जब महिलाओं को पीरियड्स आना बंद हो जाते हैं तो इसे मेनोपॉज कहते हैं। इसके कारण शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन्स का लेवल कम हो जाता है। ये हार्मोन हड्डियों की सेहत को प्रभावित करते हैं।
हड्डियों के टूटने का रहता है खतरा
हड्डियों कमजोर होने के कारण इनकी डेन्सिटी यानी घनत्व भी कम होने लगता है और इस कंडीशन को ऑस्टियोपोरोसिस कहते हैं। इसमें हड्डियों के टूटने का भी खतरा रहता है। मेनोपॉज के बाद खासतौर पर एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी हार्मोन मेटाबॉलिज्म पर असर डालती है जिसकी कारण कुछ खास बोन सेल्स यानी हड्डी की कोशिकाएं जैसे ऑस्टियोक्लास्ट्स, ऑस्टियोब्लास्ट्स और ऑस्टियोसाइट्स प्रभावित होगी।

लक्षण
इसकी शुरुआत में लोगों को अक्सर समझ नहीं आता कि उन्हें ऐसी किसी बीमारी की शुरुआत हो चुकी है। जब तक किसी की कोई हड्डी न टूटे और वो डॉक्टर के पास न जाए तब तक बहुत बार ऑस्टियोपोरोसिस का डायग्नोज होना मुश्किल होता है। आमतौर पर ऑस्टियोपोरोसिस के कारण ज्यादातर फ्रैक्चर कूल्हे, मेरुदंड या कलाई मे होते हैं। कई बार बाजू या पेल्विस की हड्डियां भी टूट जाती हैं। इसमें खांसी या छींक जैसी मामूली चीज भी कभी-कभी फ्रैक्चर का कारण बनती है।
टूटी हड्डियों के अलावा भी इसके कुछ लक्षण हो सकते हैं। जैसे कि
. अचानक बुखार वाली गर्मी महसूस होना
. वैजाइना में ड्राइनेस
. पीरियड्स में बदलाव
. सिर दर्द

. रात को पसीना आना
. सेक्स ड्राइव में कमी
. जॉइंट्स में स्टिफनेस
. मूड बदलना
. चिंता
. दिल की धड़कन का बढ़ जाना
कारण
मेनोपॉज से हड्डियों का नुकसान ज्यादा होने लगता है जिसके कारण व्यक्ति में ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा भी बढ़ जाता है। हड्डियों में प्रोटीन और मिनरल्स का एक नेटवर्क होता है जो उन्हें ताकत देता है। इनमें ऑस्टियोसाइट्स जैसी अलग-अलग कोशिकाएं भी होती हैं, जो इस नेटवर्क को बनाए रखने में मदद करती हैं, लेकिन एस्ट्रोजन हार्मोन हड्डी की संरचना को प्रभावित करेगा, इसलिए मेनोपॉज में इसका स्तर घटने से हड्डियों पर असर पड़ेगा। मेडिकल न्यूज टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, ऑस्टियोसाइट्स नामक सेल्स SEMA3A नाम का एक प्रोटीन बनाते हैं जो हड्डी मैट्रिक्स को बनाए रखता है। उनका मानना है कि जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ेगी और उनके एस्ट्रोजन और SEMA3A का स्तर गिरता है तो ऑस्टियोसाइट्स मरने लगते हैं जिससे हड्डियों की संरचना पर फर्क पड़ेगा।ऑस्टियोपोरोसिस का पता लगाने के लिए एक बोन डेन्सिटी स्कैन किया जाता है जिसको DEXA स्कैन कहते हैं। यह काफी सरल स्कैन होता है जिसमें लगभग 10-20 मिनट लगते हैं। इस टेस्ट के आधार पर ही पता चलता है कि आपको ऑस्टियोपोरोसिस है या फिर नहीं।
AIIMS ने ढूंढा इलाज
दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टर्स की एक टीम पिछले काफी समय से पोस्ट-मेनोपॉजल ऑस्टियोपोरोसिस का इलाज ढूंढ़ने में जुटी हुई है। ऐसे में अब बताया जा रहा है कि उनके ट्रीटमेंट का चूहों पर क्लिकनिकल ट्रायल सफल हो चुका है। अब इसका मानव ट्रायल होगा। टीम का कहना है कि मानव पर ट्रायल करने के बाद मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी से बचाव किया जा सकता है। इसके साथ ही, एम्स पहला संस्थान बन गया है जिसने इम्यूनोथैरेपी के जरिए पोस्ट-मेनोपॉजल ऑस्टियोपोरोसिस को कंट्रोल करने में कामयाबी हासिल की है।

