हम सभी इच्छा मृत्यु के बारे में जानते हैं, लेकिन क्या आप लिविंग विल के बारे में जानते हैं? दरअसल इस पर काफी बहस हो रही है। केरल के सर्जन डॉक्टर आईपी यादेव ने लिविंग विल की अहमियत को समझाया। बीबीसी के अनुसार उन्होंने 2010 में अपने जीवन का सबसे कठिन निर्णय लिया था। उन्हें यह तय करना था कि वह अपने कैंसर से जूझ रहे पिता को ज़िंदा रखने की कोशिश करें या उनकी आख़िरी इच्छा का सम्मान करें, जिसमें उन्होंने सभी इलाज बंद कर अपनी तकलीफ़ ख़त्म करने की बात कही थी। डॉक्टर यादेव कहते हैं, बेटे के तौर पर, अंतिम क्षण तक पिता को जीवित रखना मेरा कर्तव्य था, लेकिन मेरे इस फ़ैसले से वे दुखी हुए। अंततः उन्होंने आईसीयू में दम तोड़ दिया। इस अनुभव ने उन्हें लिविंग विल की अहमियत समझने में मदद की।
लिविंग विल क्या है?
लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज है, जो किसी व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार देता है कि अगर वह किसी लाइलाज बीमारी या ऐसी स्थिति में चला जाए, जहां ठीक होने की कोई संभावना न हो और वह खुद फैसले लेने में असमर्थ हो, तो उसे किस तरह की चिकित्सा देखभाल मिलनी चाहिए। यह दस्तावेज़ खासतौर पर उस व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह यह निर्णय ले सके कि उसे लाइफ सपोर्ट मशीनों पर रखा जाए या नहीं। इसके साथ ही वह यह भी तय कर सकता है कि उसे पर्याप्त दर्द निवारक दवाइयां दी जाएं या नहीं।
लिविंग विल और इच्छा मृत्यु में अंतर
लिविंग विल को लेकर एक सामान्य भ्रम है कि यह इच्छा मृत्यु (Euthanasia) के समान है, जबकि ऐसा नहीं है। लिविंग विल में व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम क्षणों में चिकित्सा उपचार को बंद करने का निर्णय लेता है, लेकिन यह जीवन को समाप्त करने का निर्णय नहीं है। दूसरी ओर इच्छा मृत्यु में किसी व्यक्ति को जानबूझकर मौत में मदद करने की कोशिश की जाती है, जो कि भारत में अवैध है।
भारत में लिविंग विल की स्वीकृति और जागरूकता
भारत में लिविंग विल को लेकर जागरूकता अभी तक बहुत कम है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे कानूनी मान्यता दी थी, जिससे लोग पैसिव यूथेनेशिया चुन सकते हैं, यानी जीवन रक्षक उपचार को रोकने का अधिकार पा सकते हैं। लेकिन एक्टिव यूथेनेशिया यानी आत्महत्या में मदद करना अभी भी अवैध है।
केरल में लिविंग विल की पहल
केरल के कोल्लम जिले में लिविंग विल के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया गया है, जिसे डॉ. आईपी यादेव और उनकी टीम चला रहे हैं। इस कार्यक्रम में लोगों को फोन और व्यक्तिगत संपर्क से लिविंग विल के बारे में जानकारी दी जाती है। इसके अलावा स्वयंसेवक जागरूकता अभियान चलाकर लिविंग विल के टेम्पलेट भी वितरित करते हैं। यह पहल लोगों को अपनी इच्छाओं के अनुसार अंतिम समय में चिकित्सा उपचार को लेकर फैसले लेने के लिए प्रेरित करती है।
चुनौतियां और कानूनी प्रक्रिया
लिविंग विल को बनाने के लिए एक व्यक्ति को इसे स्वयं लिखना होगा, दो गवाहों की मौजूदगी में हस्ताक्षर करने होंगे, और इसे नोटरी या राजपत्रित अधिकारी से प्रमाणित करवाना होगा। इसके बाद इसकी एक कॉपी राज्य सरकार को सौंपनी होगी। हालांकि इस प्रक्रिया को लागू करने में कई चुनौतियां सामने आ रही हैं। कई राज्य सरकारों ने इसे लागू करने के लिए ठोस व्यवस्था नहीं बनाई है।
डॉक्टर निखिल दातार की पहल
डॉक्टर निखिल दातार, जिन्होंने दो साल पहले अपनी लिविंग विल बनाई, ने इस मुद्दे पर अदालत में भी याचिका दायर की थी। उनका कहना है कि जब किसी मरीज की स्थिति यह हो कि वह ठीक नहीं हो सकता, तो लिविंग विल परिवार और डॉक्टरों की मुश्किलें कम कर सकती है। वे मानते हैं कि लिविंग विल के माध्यम से परिवार को सटीक निर्णय लेने में मदद मिलती है।
लिविंग विल का महत्व
डॉ. आईपी यादेव के अनुसार लिविंग विल का विकल्प इच्छा मृत्यु का चयन नहीं है, बल्कि यह उस व्यक्ति के अधिकार को सुनिश्चित करना है कि वह अपनी मृत्यु के समय उपचार के विकल्प का चयन कर सके। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि लिविंग विल से संबंधित जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है, जिससे लोग इस विकल्प का सही तरीके से उपयोग कर सकें।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले डॉक्टर या एक्सपर्ट्स की सलाह जरूर लें।
