सेंट्रल कोलकाता के एक निजी अस्पताल जेएनरे ने 30 नवंबर को एक घोषणा की। अस्पताल के एक वरिष्ठ प्रबंधक ने कहा कि जब तक बांग्लादेश में स्थिति में सुधार नहीं होगा तब तक वे बांग्लादेश के किसी भी मरीज का इलाज नहीं करेंगे। बंगाल के सिगुड़ी में एक डॉक्टर ने मांग की कि सभी को, खास तौर पर बांग्लादेशी मरीजों को, उनके चैंबर में प्रवेश करने से पहले भारतीय झंडे के आगे झुकना पड़ेगा। चिकित्सा बिरादरी के वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि ने कहा कि डॉक्टरों द्वारा मरीजों की पहचान के आधार पर उनका इलाज करने से इनकार करने के ऐसे मामले चिकित्सा नैतिकता के उल्लंघन का सवाल उठाते हैं।
अगस्त की शुरुआत से ही बांग्लादेश में उथल-पुथल
उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में भारतीय झंडे के कथित अपमान को लेकर कुछ डॉक्टरों में गुस्सा है, लेकिन उनमें से कुछ ने ही देश के मरीजों का इलाज करने से इनकार किया है। अगस्त की शुरुआत से ही बांग्लादेश में उथल-पुथल मची हुई है, जब देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के कारण शेख हसीना सरकार गिर गई थी। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार राजनीतिक अनिश्चितता और अशांति से जूझ रही है।
आपको बता दें कि 25 नवंबर को बांग्लादेश पुलिस द्वारा हिंदू नेता चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ़्तारी की गई जो इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस – इस्कॉन के एक भिक्षु हैं। भारत के विदेश मंत्रालय ने दास की गिरफ़्तारी की निंदा की और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमलों के आरोपों को उठाया। 3 दिसंबर को, भारतीय प्रदर्शनकारियों ने अगरतला में बांग्लादेश उच्चायोग के परिसर में जबरन घुसकर तोड़फोड़ की, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।
इलाज के लिए भारत आने वाले बांग्लादेशी रोगी हुए प्रभावित
इस अनिश्चितता ने इलाज के लिए भारत आने वाले बांग्लादेशी रोगियों को प्रभावित किया। विश्लेषक और रेटिंग समूह केयरएज द्वारा अगस्त में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया कि भारत आने वाले सभी अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा पर्यटकों में से आधे से ज्यादा बांग्लादेशी हैं। इसके बाद भारत द्वारा अगस्त में वीजा प्रतिबंध लगाया गया, जिसके बाद बांग्लादेशी मरीज इलाज के लिए यात्रा नहीं कर पा रहे हैं। प्रतिबंधों और बढ़ते तनाव का व्यापक असर हो रहा है। भारतीय स्वामित्व वाले अस्पतालों और चिकित्सा पर्यटन से जुड़े व्यवसायों को कम लोगों के आने के कारण नुकसान उठाना पड़ा है। भारत केवल छात्रों और जरूरी मेडिकल मामलों के लिए सीमित संख्या में वीजा की अनुमति दे रहा है।
बांग्लादेशी मरीजों की संख्या में कमी
केयरएज की एक रिपोर्ट में बांग्लादेशी मरीजों की संख्या में कमी आने का अनुमान लगाया गया है, लेकिन उम्मीद है कि साल के अंत तक स्थिति सामान्य हो जाएगी। चेन्नई में अपोलो अस्पताल की शाखा के पास एक लॉज के मालिक का कहना है कि वे हर महीने 30 से 40 बांग्लादेशियों की मेजबानी करते हैं। फिलहाल, यहाँ केवल तीन परिवार हैं और वे भी जल्द ही चले जाएँगे, क्योंकि उनका वीज़ा समाप्त होने वाला है।
उनका कहना है कि चेन्नई में किसी भी डॉक्टर या अस्पताल ने बांग्लादेशी मरीजों का इलाज करने से मना नहीं किया है। अगर ये प्रवृत्ति फैलती है, तो उनके व्यवसाय को और भी अधिक नुकसान हो सकता है, क्योंकि बांग्लादेशी मरीज सबसे पहले कोलकाता आते हैं और फिर ज़रूरत पड़ने पर दूसरे शहरों में आते हैं।
इलाज करने से मना करने वाले डॉक्टरों की आलोचना
जन स्वास्थ्य वकालत समूह जन स्वास्थ्य अभियान के राष्ट्रीय सह-संयोजक अभय शुक्ला ने बांग्लादेशियों का इलाज करने से मना करने वाले डॉक्टरों की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए और उनके क्लीनिक बंद कर दिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि यह बेहद अनैतिक है और ऐसे डॉक्टर भारत को बदनाम कर रहे हैं।
शुक्ला ने बताया कि पश्चिम बंगाल क्लीनिकल प्रतिष्ठान (पंजीकरण, विनियमन और पारदर्शिता) अधिनियम राष्ट्रीयता या धर्म के आधार पर क्लीनिकल प्रतिष्ठानों द्वारा भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा अनुशंसित मरीजों के अधिकार और जिम्मेदारी के चार्टर के तहत भी मरीजों के साथ भेदभाव करना प्रतिबंधित है। चार्टर, जिसे राज्य सरकारों द्वारा लागू किया जाना है, कहता है कि मरीजों के साथ धर्म, जातीयता, भाषाई या भौगोलिक और सामाजिक मूल के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है।
बांग्लादेशियों में अविश्वास और डर
हालाँकि जानकारी के अनुसार ये भी कहा गया है कि हाल के महीनों में कोलकाता आए कुछ बांग्लादेशी मरीजों को इलाज कराने में कोई परेशानी नहीं हुई है, लेकिन बांग्लादेशियों में कुछ अविश्वास और डर है। source: Scroll.in
