भोपाल गैस ट्रेजडी ने सिर्फ़ उस समय जीवित लोगों को ही प्रभावित नहीं किया। इस घचना ने एक ज़हरीली विरासत छोड़ी जो अजन्मी पीढ़ियों और दशकों बाद पैदा होने वाले बच्चों को प्रभावित करती रहती है। बहुत से लोग अभी भी भोपाल में जीवित रहने के लिए पूरी तरह से दवाओं पर निर्भर हैं। इस संबंधी वहां के बहुत से लोगों से बात की गई। महिला जिसने अपना नाम बानो बी (72) बताया ने कहा कि 40 सालों में लगभग 150 किलो दवाएं खा चुकी हैं।
वो काली रात

उन्होंने बताया कि उनका जन्म उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में हुआ था। 12 साल की उम्र में उनकी शादी करा दी गई थी। उनके पति इनायत खान काम की तलाश में भोपाल चले गए। उन्होंने रेलवे गोदाम में मज़दूरी करना शुरू किया। थोड़े समय बाद वे भी भोपाल आ गई। यूनियन कार्बाइड का कारखाना जेपी नगर के ठीक सामने स्थित था। उन्होंने बताया कि 16 साल की उम्र में पहली बार माँ बनी। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन उस काली रात का आगमन हो गया।
सब खाना खाकर सो गए, अचानक उन्हें खांसी आने लगी। बच्चे खांसने लगे और आंखें जलने लगीं कि जैसे किसी ने उनमें मिर्च पाउडर फेंक दिया हो, कमरे की रोशनी भी कम हो गई। वे लोग डर गए थे और समझ नहीं पा रहे थे कि हो क्या रहा है। जब वे बाहर निकले तो देखा कि लोग इधर-उधर भाग रहे हैं। चारों तरफ चीख-पुकार गूंज रही थी। वे भी अपने घर से बाहर भागे। बाद में पता चला कि सभी लोग जहरीली गैस के संपर्क में आ चुके हैं। आंखें सूज गई थीं, चेहरा काला पड़ गया था, और पेट जल रहा था।
बच्चों को स्कूल में भर्ती कराया गया, लेकिन उनकी हालत भी गंभीर थी। शुरू में अस्पताल के कर्मचारियों ने बच्चों को सौंपने से मना कर दिया और उनके पहने हुए कपड़ों की पहचान करने को कहा। एक वरिष्ठ अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद ही बच्चों को वापिस लौटाया। उनके पति की हालत बिगड़ती गई और एक साल बाद मृत्यु हो गई। उसके बाद अपने साले और भाई को भी खो दिया। गैस ट्रेजडी का बोझ मुझे ही उठाना पड़ा और वे अभी भी पीड़ित हूँ।
नई-नई समस्याएं

उन्होंने बताया कि कभी उनका वजन लगभग 100 किलो था। बीमारियों ने इस हद तक जकड़ लिया कि जीना असहनीय हो गया है। गैस के संपर्क में आने के बाद, कई महीनों तक बाहर बैठी रहीं क्योंकि मासिक धर्म चक्र अनियमित हो गया था। अंगों में दर्द होने लगा, सिरदर्द और कई बीमारियाँ परेशान करने लगीं। अस्पतालों के चक्कर लगाना आम सी बात हो गई। डॉक्टरों के दवाएँ लिखने पर नई समस्याएँ सामने आती रहीं, जिसके लिए और अधिक जाँच की आवश्यकता थी। आखिरकार इलाज के लिए गैर-लाभकारी संस्था संभावना के क्लिनिक में जाना शुरू कर दिया।
दिन में करीब 11 गोलियों का सेवन
आगे बताया कि पिछले 40 वर्षों में औसतन प्रतिदिन 11 गोलियाँ लेनी पड़ी हैं। रोजाना वे 8-10 अलग-अलग दवाइयों का सेवन करती हैं। अगर आप 40 सालों में जितनी दवाइयों का सेवन किया है उसका हिसाब लगाएँ तो यह लगभग 150 किलो है।
वे कई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही हैं, जिनमें उच्च रक्तचाप, टाइप-2 मधुमेह, सिरदर्द, जोड़ों का दर्द, चक्कर आना, अनिद्रा और पाचन संबंधी समस्याएँ शामिल हैं। लेकिन अब डॉक्टरों ने भी दवाइयाँ लिखना बंद कर दिया है और कहा है कि अगर ये गोलियाँ लेते रहेंगे तो दिमाग खराब हो जाएगा। हालाँकि वे अभी भी नींद की गोलियाँ लेती हैं, क्योंकि उनके बिना सो नहीं सकतीं।
उनका 12 वर्षीय बेटा जो गैस ट्रेजडी के बाद पीड़ित है, विकास संबंधी देरी से पीड़ित है और एक विशेष आवश्यकता वाले स्कूल में जाता है। उन्होंने बताया कि वे एक दिन काम करता है और चार दिन घर पर पड़ा रहता है।
पेंशन योजना

मुआवजा मिला लेकिन 25,000 रुपये का क्या फायदा? सरकार ने पेंशन योजना शुरू की, लेकिन इससे उन्हें बाहर रखा गया। सिर्फ उन लोगों को सूचीबद्ध किया गया, जिनकी ट्रेजडी के तुरंत बाद मौत हो गई। उनके पति की मौत साल बाद हुई, इसलिए उन्हें केवल विधवा पेंशन मिलती है, लेकिन ये तो सभी विधवाओं को मिलता है। उन्हें क्या मिला? जहरीली हवा और पानी के अलावा कुछ नहीं। जहरीला कचरा अभी भी फैक्ट्री के अंदर दबा हुआ है, और सरकार ने इसके लिए कुछ नहीं किया।
साफ पानी के लिए संघर्ष
वहां के लोगों ने स्वच्छ पानी के लिए संघर्ष किया। उन्होंने बताया कि भोपाल से दिल्ली तक दो बार पैदल मार्च किया और इस यात्रा में उनकी जांघें छिल गई थीं और जख्म भी हो गए। एक बार मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान उन्हें हिरासत में लिया गया और 13 दिनों के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया गया था। लेकिन आखिर में किसी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ये अपराधी नहीं हैं; ये कार्यकर्ता हैं, और उन्हें रिहा कर दिया गया। तब जाकर ही उन्हें नर्मदा का पानी मिलना शुरू हुआ।
हर दिन जहर के साथ जीना
वहां के लोगों को इस जहर के साथ हर दिन जीना पड़ता है। ये भी नहीं पता कि कितने दिन और जीवित रहेंगे। लेकिन हर दिन सोचा जाता है कि केवल एक रात ने सभी के जीवन को जहर में बदल दिया। अभी भी न्याय का इंतजार है। न्याय सिर्फ पैसे के बारे में नहीं है। इस आर्टिकल की प्ररेणा Down to Earth से ली गई है।
