जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण के बढ़ते खतरों के कारण वैश्विक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ने का अनुमान है। हाल ही में किए गए एक स्टडी में यह सामने आया है कि अगर गर्मी और वायु प्रदूषण का यह सिलसिला जारी रहता है, तो साल 2100 तक हर साल लगभग तीन करोड़ लोग अपनी जान गंवा सकते हैं। इस शोध में यह भी कहा गया है कि आने वाले समय में तापमान से संबंधित खतरे वायु प्रदूषण से अधिक हो सकते हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य पर और भी अधिक दबाव पड़ेगा।
मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट की स्टडी
यह स्टडी मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर केमिस्ट्री द्वारा किया गया था, जिसमें वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने सदी के अंत तक वायु प्रदूषण और अत्यधिक तापमान से होने वाली मौतों के आंकड़े का अनुमान लगाया। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस समय तक वायु प्रदूषण और गर्मी के कारण होने वाली मौतों की संख्या में भारी वृद्धि हो सकती है।
शोध के परिणाम

इस स्टडी में पाया गया है कि सदी के अंत तक वायु प्रदूषण और अत्यधिक तापमान से जुड़ी मौतों की संख्या में तीन करोड़ तक वृद्धि हो सकती है। इसका अनुमान एडवांस न्यूमेरिकल सिमुलेशन से लगाया गया है। शोध के अनुसार प्रदूषण से संबंधित मौतों में पांच गुना वृद्धि हो सकती है, जबकि तापमान से संबंधित मृत्यु दर सात गुना बढ़ सकती है।
2000 से 2090 तक के अनुमानों का विश्लेषण
इस शोध में 2000 से 2090 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। इसके अनुसार साल 2000 से हर साल लगभग 16 लाख लोग अत्यधिक गर्मी और ठंड के कारण मारे गए हैं। लेकिन सदी के अंत तक यह आंकड़ा बढ़कर 1.08 करोड़ तक पहुंच सकता है, यानी सात गुना अधिक। वहीं वायु प्रदूषण के कारण 2000 में सालाना मृत्यु दर 41 लाख थी, जो सदी के अंत तक 1.95 करोड़ तक बढ़ सकती है।
वायु प्रदूषण और भीषण गर्मी का असमान प्रभाव
यह शोध यह भी दिखाता है कि भविष्य में मृत्यु दर में भारी क्षेत्रीय अंतर हो सकता है। दक्षिण और पूर्वी एशिया में सबसे ज्यादा वृद्धि होने की संभावना है, जहां जनसंख्या में वृद्धि के कारण वायु प्रदूषण का प्रभाव अधिक रहेगा। वहीं उच्च आय वाले देशों जैसे पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और एशिया प्रशांत में अत्यधिक तापमान से होने वाली मौतों का खतरा वायु प्रदूषण से ज्यादा हो सकता है।
वायु प्रदूषण की तुलना में भीषण गर्मी एक बड़ा खतरा
स्टडी में यह भी सामने आया है कि कुछ उच्च आय वाले देशों जैसे अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जापान, और न्यूजीलैंड में पहले ही यह बदलाव दिखाई दे रहे हैं, जहां गर्मी से होने वाली मौतों की संख्या वायु प्रदूषण से बढ़ने वाली मौतों से ज्यादा हो गई है। साथ ही मध्य और पूर्वी यूरोप के देशों और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी वायु प्रदूषण की तुलना में भीषण गर्मी स्वास्थ्य के लिए एक अधिक बड़ा खतरा बन सकती है।
जलवायु परिवर्तन का सीधा असर स्वास्थ्य पर
शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बन चुका है। बढ़ते तापमान और वायु प्रदूषण के कारण आने वाले दशकों में लाखों लोगों की जान जा सकती है, अगर तत्काल उपाय नहीं किए गए तो।
उपायों की तत्काल आवश्यकता
इस स्टडी के निष्कर्षों से यह साफ है कि हमें इन बढ़ते खतरों को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे। शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य संकट से बचने के लिए निर्णायक शमन उपायों को लागू करना अनिवार्य है। अगर अब भी कदम नहीं उठाए गए, तो सदी के अंत तक वैश्विक स्तर पर जीवन की गुणवत्ता और स्वास्थ्य दोनों पर गंभीर असर पड़ेगा।
