कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में हाल ही में सामने आया एक विवादास्पद मामला पूरी तरह से सुर्खियों में है। यहां ट्रेनी डॉक्टर की हत्या और बलात्कार के मामलों की सीबीआई द्वारा जांच की जा रही है। जांच के दौरान सीबीआई को अस्पताल की मोर्चरी से डेड बॉडी के अंग निकालकर बेचने के आरोप मिले हैं। ये आरोप पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष के करीबी लोगों पर लगे हैं। हालांकि सीबीआई ने अभी तक इस मामले की पुष्टि नहीं की है, लेकिन यह मामला गंभीर सवाल उठाता है: क्या मोर्चरी में आई डेड बॉडी के अंग निकालकर उनकी तस्करी की जा सकती है?
अंग तस्करी का मामला
अंगों की तस्करी का सबसे बड़ा कारण अंगों की उच्च मांग और कम आपूर्ति है। हर साल लाखों लोगों को अंग ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है, लेकिन अंगदान करने वालों की संख्या बहुत कम होती है। NOTTO की रिपोर्ट के अनुसार भारत में केवल एक प्रतिशत लोग ही अंगदान करते हैं। इसके मुकाबले अंगों की जरूरत वाले मरीजों की संख्या काफी अधिक है। उदाहरण के लिए हर साल 1.8 लाख लोगों को किडनी की जरूरत होती है, लेकिन केवल 6 हजार को ही किडनी मिलती है। इसी प्रकार 2 लाख मरीजों को लिवर की जरूरत होती है, लेकिन 10 प्रतिशत को ही लिवर मिल पाता है। अंगों की कमी के चलते अंग तस्करी का कारोबार फल-फूल रहा है।
अंग तस्करी और मोर्चरी में डेड बॉडी
मोर्चरी में आई डेड बॉडी से अंगों की तस्करी पर विशेषज्ञों के मत विभाजित हैं। दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल के फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग के डॉ. बीएन मिश्रा के अनुसार, मोर्चरी से अंग निकालकर बेचना संभव नहीं है। उनका कहना है कि मृत शरीर की मोर्चरी में आने से लेकर पोस्टमार्टम तक कई घंटे लगते हैं, और इस दौरान अंग काम करना बंद कर देते हैं। अंगों को ट्रांसप्लांट के लिए एक निश्चित समय सीमा होती है—हार्ट को 4-6 घंटे, लंग्स को 4-8 घंटे, लिवर को 8-12 घंटे, आंतों को 8-16 घंटे और किडनी को 24-36 घंटे के भीतर ट्रांसप्लांट करना पड़ता है। इन समय सीमाओं के बाद अंगों की उपयोगिता समाप्त हो जाती है।
लाइव डोनर और अंग तस्करी
हालांकि मोर्चरी में आई डेड बॉडी से अंग निकालने की संभावना कम है, लेकिन लाइव डोनर के अंगों की तस्करी की संभावना बनी रहती है। दिल्ली के एक बड़े अस्पताल के फॉरेंसिक विभाग के एक डॉक्टर के अनुसार, अगर किसी मरीज की मेडिकल हिस्ट्री और ब्लड ग्रुप की जानकारी पहले से उपलब्ध हो, तो अंग तस्करी के लिए एक नेटवर्क सक्रिय हो सकता है। इसमें अस्पताल का कोई व्यक्ति अंग तस्कर को सूचित कर सकता है कि कौन सा मरीज मरने वाला है और उसके अंग किसे चाहिए। अगर ब्लड ग्रुप मैच करता है, तो अंग निकालकर उनकी तस्करी की जा सकती है।
अंग तस्करी की कानूनी और नैतिक समस्याएं
अंग तस्करी की समस्या सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में व्याप्त है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में हर साल 12 हजार अंग गैरकानूनी तरीके से ट्रांसप्लांट किए जाते हैं। WHO की ग्लोबल फाइनेंशियल रिपोर्ट के अनुसार, किडनी, हार्ट, लिवर और आंतों के 10 प्रतिशत ट्रांसप्लांट काला बाजारी के जरिए होते हैं। इस तरह की तस्करी में अधिकतर मामलों में लाइव डोनर के अंग शामिल होते हैं।
