डॉक्टर वही है जो समय से मरीज की जान बचा ले। कुछ ऐसा ही मामला असम से सामने आया है। जहां के डॉक्टर और विधानसभा के डिप्टी स्पीकर नुमल मोमिन चर्चा में हैं। दरअसल मोमिन ने एक एक्सीडेंट के दौरान घायल लोगों की जान बचाने का अपना डॉक्टर होने का फर्ज निभाया है।

घायलों की समय पर की मदद और बचायी जान

आपको बता दें मोमिन हमेशा ट्रेवल के दौरान अपने साथ कुछ दवाएं रखते हैं ताकि कभी भी जरूरत पड़ने वे उन मेडिसिन का लोगों की जान बचाने के लिए यूज़ कर सकें। हाल ही में उनके इस रूप की झलक देखने को मिली जब उन्होंने एक्सीडेंट में घायल लोगों की मदद की।

बता दें नागालैंड की सीमा से लगे कार्बी आंगलोंग जिले में अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र बोकाजन की यात्रा पर निकले मोमिन का काफिला बीच रास्ते में रुका क्योंकि हाइवे पर एक दुर्घटना में टू-व्हीलर और एक कार के बीच टक्कर में एक कपल घायल हो गया था। उस समय शाम के करीब 4.30 बजे थे और लोगों को लगा कि यह कपल खासकर महिला मर चुकी है।

लेकिन जैसे ही मोमिन ने उनकी नब्ज चेक की तो उन्हें पता चला कि उनकी सांसे चल रही हैं।  महिला का एक हाथ और एक पैर टूट चूका था। ऐसे में उन्होंने सड़क के किनारे बाड़ से बांस की कुछ पट्टियां लेके अपने गमोसा की मदद से इन्हें टेम्पररी स्प्लिंट के रूप में महिला के हाथ और पैर पर बांध दिया। इतना ही नहीं इस दंपति को उन्होंने अपनी कार में अस्पताल तक पहुंचाया। मोमिन की मदद से इस कपल की जान बच पाई।  

नेता ही नहीं जिमेदार डॉक्टर भी

बता दें 2016 से मोमिन दो बार बीजेपी के विधायक रह चुके हैं। हालांकि अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के लिए वह एक राजनेता से भी अधिक है। उनका निर्वाचन क्षेत्र कम विकसित क्षेत्रों में से एक है। जब भी वह गुवाहाटी से लगभग 290 किमी पूर्व में बोकाजन शहर या अपने पैतृक गांव डिल्लावजन का दौरा करते हैं, तो लोगों को उनके डॉक्टर होने का भी लाभ भी मिलता है।

आखिर कौन है मोमिन

बता दें मोमिन का डॉक्टर बनने का सफर काफी चुनौतियों भरा रहा। साल 1972 में गुवाहाटी में उनका जन्म हुआ। उनका बचपन डिल्लावजन में बिता। साल 1989 में अपने गांव के पास बालीपाथर हाई स्कूल से उन्होंने 10वीं की कक्षा पास की और दो साल बाद अपने घर से लगभग 70 किमी दूर दीफू गवर्नमेंट कॉलेज से विज्ञान स्ट्रीम में 12वीं कक्षा पास की। उनकी उच्च शिक्षा के लिए घरवालों के पास पैसे नहीं थे और मोमिन भी खेती में हाथ बंटाते थे।

डॉक्टर बनने में रिश्तेदारों का हाथ

साल 1994 में उनके एक रिश्तेदार उन्हें गुवाहाटी ले आए और एमबीबीएस प्रवेश परीक्षा के लिए दो महीने की कोचिंग क्लास में उनका एडमिशन करवाया। उनके रिश्तेदार असम के प्रमुख शैक्षणिक संस्थान कॉटन कॉलेज में पढ़ाते थे। मोमिन ने पूरी मेहनत से अनुसूचित जनजाति वर्ग में परीक्षा में पहला स्थान पाया।

इसके बाद उन्होंने दिल्ली के दो अस्पतालों में काम किया ताकि पैसे कमा सकें। साल 2006 में अपना एमडी पूरा किया और एएमसी में रजिस्ट्रार के रूप में शामिल होने से पहले शिलांग में उत्तर पूर्वी इंदिरा गांधी क्षेत्रीय स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान संस्थान में तीन साल तक काम किया। मोमिन की पत्नी अनुपमा हाजोंग, एक निजी अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं और उनकी सामुदायिक सेवा को सपोर्ट करती हैं।

मरीजों की मदद करने का उनका जुनून उनके छात्र जीवन के दौरान ही शुरू हो गया था। जहां उन्होंने रक्तदान शिविरों का आयोजन किया और सेवा भारती के साथ मिलकर एक साल में 26 मुफ्त स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए।

By tnm

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