जब मोबाइल फोन नहीं होते थे तब कबूतर ही हमारे सन्देश एक दूसरे तक पहुंचाते थे। यही कबूतर डाकिये की भूमिका निभाते थे। लेकिन आपको बता दें इनदिनों ये कबूतर आपकी जान के लिए खतरा साबित हो रहे हैं। दरअसल हाल ही में एक स्टडी में ये सामने आया है कि उनके पंखों और बीट के संपर्क में लंबे समय तक रहने वाले लोगों में फेफड़ों की क्रोनिक बीमारी होने का खतरा है।
11 साल का लड़का कबूतर के संपर्क आने से बीमार
बता दें हाल ही में एक केस स्टडी में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि वसुंधरा एन्क्लेव के एक 11 साल के लड़के को कबूतर के पंखों और बीट के संपर्क में आने के कारण सांस की गंभीर बीमारी हो गई है। जिसके बारे में लोग कम जानते हैं।
अस्पताल में कराना पड़ा भर्ती
बता दें एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस लड़के की खांसी पहले तो सामान्य लग रही थी, लेकिन जल्दी ही बढ़ गई। इतना बढ़ गई कि उसे तत्काल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मेडिकल स्क्रीनिंग से पता चला कि इस लड़के के फेफड़ों में सूजन थी और ये स्थिति हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस (एचपी) की तरह थी।
कबूतर के पंखों और बीट से एलर्जी
बता दें इस लड़के को कबूतर के पंखों और बीट से एलर्जी के कारण सांस लेने में दिक्कत हो रही थी और उसे तत्काल मेडिकल हेल्प की जरूरत थी। सर गंगाराम अस्पताल के बाल चिकित्सा गहन देखभाल इकाई के सह-निदेशक डॉक्टर धीरेन गुप्ता और उनकी चिकित्सा टीम की देखरेख में, लड़के का गहन उपचार किया गया। टीम में बाल चिकित्सा के अध्यक्ष डॉ. अनिल सचदेव, पीआईसीयू बाल चिकित्सा के निदेशक डॉ. सुरेश गुप्ता और बाल चिकित्सा में सहयोगी सलाहकार डॉ. नीरज गुप्ता भी शामिल थे। डॉक्टरों की टीम ने उच्च प्रवाह प्रणाली का इस्तेमाल करके ऑक्सीजन थेरेपी दी और स्टेरॉयड उपचार प्रदान किया।
बच्चे पर इलाज के दौरान नजर रखी गई
बता दें लड़के का इलाज के बाद फेफड़ों की सूजन में कमी पायी गयी। जिससे वह लगभग सामान्य रूप से सांस ले पा रहा था। हाल में सुधार के बाद मरीज को छुट्टी दे दी गई। लेकिन अध्ययन के उद्देश्य से लगातार उस पर निगरानी रखी गई। वहीँ उन्होंने पक्षियों की बीट और पंखों जैसे संभावित पर्यावरणीय ट्रिगर्स के बारे में जागरूकता की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ. गुप्ता ने हानिरहित दिखने वाले परिंदों द्वारा होने वाले संभावित नुकसान को कम आंकने के खिलाफ भी चेतावनी दी, जब वे मनुष्यों के साथ एक ही स्थान पर रहते हैं। इन पक्षियों से जुड़े हानिकारक पदार्थों के संपर्क में आने के जोखिम को कम करने के लिए उचित सावधानी बरतना और स्वच्छ वातावरण बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
15 साल से कम उम्र के बच्चों में अधिक
वहीँ उन्होंने ये भी बताया है कि एचपी आमतौर पर वयस्क आबादी में देखा जाता है। हालांकि, यह 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में भी पाया जाता है और अक्सर इसकी पहचान नहीं हो पाती है। यह बचपन में होने वाली एक दुर्लभ बीमारी है, जिसमें प्रति 10 लाख बच्चों में 4 मामले सामने आते हैं। एचपी बच्चों में लॉन्ग-टर्म इंटरस्टिटियल लंग डिजीज यानी दीर्घकालिक अंतरालीय फेफड़े की बीमारी (ILD) का एक सामान्य प्रकार भी है।
