हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड लीव की याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया है, जिससे इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा विवाद उत्पन्न हुआ है। याचिका में यह दावा किया गया था कि महिलाओं को उनके मासिक धर्म के दौरान अवकाश की अधिकतम अवधि देनी चाहिए, ताकि उनकी शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो सके। पीरियड लीव यानी मासिक धर्म के दौरान काम से अवकाश, विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है। यह न केवल उनके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होता है, बल्कि इसे महिलाओं की समृद्धि और समाज में समानता के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।
बिहार राज्य में मिलती है पीरियड लीव
बता दें कि वकील शैलेंद्रमणि त्रिपाठी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पीरियड लीव की याचिका दर्ज की गई है । बता दें कि उन्होंने कोर्ट से पीरियड के समय महिलाओं को होने वाली समस्या से आराम दिलाने के लिए राज्य सरकारों से छुट्टी के नियम बनाने के निर्देश जारी करने की मांग की थी। साथ ही याचिका में मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1961 धारा 14 को लागू करने की भी बात की गई है, जिसमें छात्राओं और महिला कर्मचारियों को पीरियड लीव देने को कहा गया है। वहीं मौजूदा समय में बिहार ही एक अकेला ऐसा राज्य है जहां 1992 की नीति के तहत महिलाओं को पीरियड लीव दी जाती है।
जानिए आखिर कोर्ट ने क्या कहा
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को सुनने से पहले ही इसे इंकार कर दिया और कहा कि इस संबंध में नियम बनाने के लिए केंद्र सरकार, सभी हितधारकों और राज्यों के साथ बातचीत करना चाहिए। वहीं चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने पीरियड लीव को लेकर बताया कि अगर इस लीव को जरूरी बनाते हैं तो महिलाएं वर्कफोर्स से दूर हो जाएंगी। साथ ही उन्होंने कहा कि इस पर नीति बनाने का काम सरकार का है कोर्ट का नहीं। ऐसे में सरकार को इस मामले पर ध्यान देना चाहिए।
