टीबी रोग वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य समस्या है, और भारत में इसकी संख्या विशेष रूप से बड़ी है। साल 2019 में, भारत में लगभग 24 लाख लोगों को टीबी का संक्रमण हुआ था। वहीं टीबी का इलाज काफी महंगा है। ऐसे में इस समस्या का समाधान करने के लिए सस्ती और सुलभ जांच की आवश्यकता थी, जिससे ज्यादा लोगों को समय पर उपचार मिल सके। इसलिए भारत ने हाल ही में विश्व में सबसे सस्ती टीबी जांच तकनीक का आविष्कार किया है, जिससे इस खतरनाक रोग की जांच सिर्फ 35 रुपये में कराई जा सकेगी। यह खबर स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांति ला सकती है, खासकर देश के गरीब वर्ग के लोगों के लिए।
आखिर क्या है इलाज
बता दें कि ICMR यानी भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने क्रिस्पर आधारित दो तकनीक को ढूंढ निकाला है जो माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस मतलब की टीबी के बारे में आसानी से पता लगा सकता है। पहले तकनीक का नाम ग्लो टीबी पीसीआर किट है जिसकी मदद से मरीज के सेंपल से डीएनए को अलग किया जाता है। वहीं दूसरी तकनीक का नाम रैपिड ग्लो डिवाइस है , जोकि एक इनक्यूबेटर है और डीएनए में मौजूद वायरस की पहचान करता है।
ICMR ने प्राइवेट कंपनियों से मांगा प्रस्ताव
बता दें कि ICMR इन दोनों तकनीकों को मार्केट में लाने के लिए प्राइवेट कंपनियों से सुझाव मांगा है। साथ ही स्पष्ट किया है कि इस तकनीक पर मालिकाना अधिकार आईसीएमआर के पास होगा। इतना ही नहीं इसे पेटेंट कराने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। वहीं ICMR ने इन उत्पादनों के लिए एक टीम का भी गठन किया है।
ICMR के मुताबिक यह तकनीक टीबी के शुरुआती लक्षण में ही संक्रमण की पहचान कर सकती है और करीब दो घंटे में 1500 से ज्यादा नमूनों की एक साथ जांच कर सकती है। यह तकनीक इतना आसन है कि इसे किसी भी गांव के प्राइमेरी हेल्थ सेंटर में रखकर यूज किया जा सकता है। वहीं यह लोगों के लिए उपचार महज 35 रूपय मिल सकेगा।
अब गरीब टीबी पेशेंट भी करवा सकते हैं इलाज
इस नई तकनीक का उपयोग करते हुए जांच की लागत को कम करने में सफलता मिली है। पहले टीबी की जांच की लागत लगभग 2,000 रुपये से भी अधिक होती थी, जिससे गरीब वर्ग के लोग इस सेवा का लाभ नहीं उठा पाते थे। इस नई तकनीक के आने से ज्यादा लोग टीबी की स्क्रीनिंग करा सकेंगे, और समय रहते उपचार शुरू कर सकेंगे।
सार्वजनिक स्वास्थ्य को मिल सकती है मजबूती
इस उपलब्धि का महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह तकनीक भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व भर में टीबी के संदर्भ में उपयोगी साबित हो सकती है। गरीब और दूरसंचार इलाकों में स्थापित स्वास्थ्य सेवाओं के लिए इससे एक नई दिशा मिल सकती है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य को मजबूती मिल सकती है।
इस तकनीक के विकास के पीछे भारतीय वैज्ञानिकों की मेहनत और निष्ठा की भावना है, जो समाज के हित में नई स्वास्थ्य सेवाओं के लिए संकल्पित हैं। यह उनकी सफलता है कि वे वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाने में सक्षम हो सकते हैं, और गरीब वर्ग को भी मुफ्त और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने में सक्षम बना सकते हैं।
