क्या आपका बच्चा भी 20 महीने से ज्यादा हो गया है। लेकिन अभी भी वो घुटने के बल पर नहीं चल पा रहा है। अगर हां तो कहीं आपका बच्चा भी इस जेनेटिक बीमारी से तो पीड़ित नहीं है। हाल ही में राजस्थान से भी कुछ ऐसा ही मामला समाने आया।

दरअसल राजस्थान का हृदयांश 20 महीने बाद भी घुटने के दम पर नहीं चल पाता था। जिसके बाद परिवार ने बच्ची की फोर्टिस हॉस्पीटल में जांच कारवाई। जहां पर पता चला कि बच्चे को एक जेनेटिक बीमारी यानी स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी की बीमारी है, जिस वजह से वो चल फिर नहीं पा रहा है।

इसके इलाज के लिए जोलगेनेस्मा इंजेक्शन लगवाने की जरूरत है, जो की दुनिया का सबसे महंगा इंजेक्शन है। इसके एक इंजेक्शन की कीमत करीब 17.5 करोड़ रुपए होती हैं जो अमेरिका से आएगा। वहीं अब उसे दुनिया का सबसे महंगा इंजेक्शन जोलगेनेस्मा लगाया गया। अब हृदयांश भी आम लोगों की तरह जिंदगी जी सकेगा।

अमेरिकी कंपनी ने भी हृदयांश के इलाज में किया सहयोग

बता दें कि हृदयांश को बचाने के लिए एक मुहिम चलाई गई थी। इसके बाद लोग क्राउड फंडिंग के लिए आगे आए जिससे हृदयांश का इलाज संभव हो सकेगा। वहीं बच्चे की मदद के लिए आमजन के साथ पुलिस विभाग भी सामने आए । बच्चे के चाचा स्वप्निल ने बताया कि इंजेक्शन बनाने वाली अमेरिकी कंपनी ने भी हृदयांश के इलाज में काफी मदद की है। उन्होंने इंजेक्शन की 17.5 करोड़ रुपए की राशि को चार किश्तों में जमा कराने की छूट दी है। अब तक क्राउड फंडिंग से जमा हुए 9 करोड़ रुपए से इंजेक्शन की पहली किश्त जमा करा दी है। बाकी राशि को तीन किश्तों में एक साल में जमा कराया जाएगा।

जानें क्या होता हो जेनेटिक स्पाइनल मस्कुलर

स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (एसएमए) एक विकार है जो मोटर न्यूरॉन्स-तंत्रिका कोशिकाओं को प्रभावित करता है। वहीं यह बीमारी बच्चे को मां के गर्भ से जन्मजात होती है। दरअसल यह बीमारी एसएमएन -1 और एसएमएन-2 जींस से होती है। जिसमें मोटर न्यूरॉन्स की कमी हो जाने से से मांसपेशियां कमजोर रहती हैं और बच्चा खड़ा नहीं हो पाता है और ना ही चल पाता है। इसके अलावा सांस लेने व खाने-पीने में भी दिक्कत होती है। ऐसे बच्चों की मां के पेट में हलचल काफी कम होती है। हालांकि यह बीमारी चार टाइप की होती है जैसे कि-

टाइप-01 में पेट में ही बच्चे खत्म हो जाते हैं।

टाइप 02 में उठ बैठ नहीं सकते और इन की उम्र सिर्फ 10 वर्ष तक ही होती है

टाइप-03 वालों का जीवन 20-30 साल तक ही होता है

टाइप 04 के बच्चे नॉर्मल होते हैं

24 महीने में इलाज न मिलने पर बढ़ सकती है प्रॉब्लम

बता दें कि अगर 24 महीने के अंदर इस बीमारी का इलाज नहीं कराया जाता है तो ये बीमारी धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैल जाती है और फैफड़े भी काम करना बंद कर देते हैं। यहां तक की बच्चे का जान जाने का भी खतरा रहता हैं। इसके लिए विदेश से विशेष प्रकार के इंजेक्शन की जरूरत होती है जोकि काफी महंगी मिलती है।

By tnm

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