जीका वायरस जो 1947 से वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा जोखिम बना हुआ था, अब भारत में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि की ओर बढ़ रहा है। इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड (IIL) ने ऑस्ट्रेलिया के ग्रिफिथ विश्वविद्यालय के साथ मिलकर एक टीका विकसित किया है, जो जीका वायरस से बचाने में सक्षम हो सकता है। यह टीका अब परीक्षण के पहले चरण में प्रवेश करने जा रहा है। इस परीक्षण के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड के साथ साझेदारी की है। टीके का यह चरण भारत के विभिन्न हिस्सों में आयोजित होगा, और यह उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही इसका उपयोग आम जनता के लिए उपलब्ध होगा।
जीका वायरस का इतिहास और टीके की आवश्यकता
जीका वायरस पहली बार 1947 में युगांडा के जंगलों में पाया गया था। यह वायरस मच्छरों के माध्यम से फैलता है और आमतौर पर हल्के बुखार, सिरदर्द, और शरीर में दर्द जैसे लक्षण पैदा करता है। हालांकि गर्भवती महिलाओं के लिए यह वायरस गंभीर हो सकता है, क्योंकि इससे उनके नवजात शिशुओं में माइक्रोसेफली और अन्य गंभीर जन्मजात विकृतियां हो सकती हैं। इसके अलावा जीका वायरस संक्रमण से गुलियन-बैरे सिंड्रोम, एक न्यूरोलॉजिकल विकार, भी विकसित हो सकता है। इस कारण से, जीका वायरस के लिए एक टीका विकसित करने की आवश्यकता हमेशा से महसूस की जाती रही है।
टीका कैसे बनाया गया
IIL और ग्रिफिथ विश्वविद्यालय ने मिलकर कोडन डी-ऑप्टिमाइज्ड लाइव एटेन्यूएटेड जीका टीका विकसित किया है। इस टीके का प्री-क्लीनिकल मूल्यांकन पूरा हो चुका है, जिसमें इसके प्रभाव और सुरक्षा का प्रारंभिक मूल्यांकन किया गया। अब यह टीका क्लीनिकल परीक्षण के तीन चरणों से गुजरेगा। इनमें से पहला चरण भारत में आयोजित होगा, और इसके लिए ICMR और IIL ने एक समझौता किया है।
ICMR का महत्वपूर्ण योगदान
ICMR ने इस टीके के परीक्षण के लिए अपने देशव्यापी नेटवर्क का उपयोग किया है। ICMR के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने बताया कि उन्होंने हाल ही में एक ऐसा नेटवर्क लॉन्च किया है, जिसमें छोटे अणुओं, जैविक पदार्थों या फिर टीका पर कोई भी संस्थान या फार्मा कंपनी मानव सुरक्षा अध्ययन कर सकती है। इससे पहले, इस तरह के परीक्षण के लिए संस्थानों को विदेशों में जाना पड़ता था, लेकिन अब यह सुविधा भारत में उपलब्ध हो गई है। इस नेटवर्क के अंतर्गत मुंबई के एसीटीआरईसी और केईएम, चेन्नई का एसआरएम, और उत्तर भारत में चंडीगढ़ पीजीआई जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में परीक्षण किया जाएगा।
IIL की योजना
इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक, डॉ. के. आनंद कुमार ने बताया कि दुनिया भर में जीका वायरस के प्रकोप से लोग कई सालों से जूझ रहे हैं। हालांकि अब तक इसका कोई भी टीका उपलब्ध नहीं था। लेकिन अब इस कोडन डी-ऑप्टिमाइज्ड वायरल टीके की मदद से इस बीमारी से निपटने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि अगर मानव सुरक्षा परीक्षणों के परिणाम सकारात्मक होते हैं, तो यह टीका जल्द ही लोगों के लिए उपलब्ध कराया जा सकेगा।
बीमारी की गंभीरता
जीका वायरस आमतौर पर हल्की बीमारी का कारण बनता है, और इसके लिए किसी विशेष उपचार की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि गर्भवती महिलाओं के लिए यह गंभीर हो सकता है क्योंकि यह शिशु में गंभीर जन्मजात विकृतियों का कारण बन सकता है। ICMR के अनुसार इस वायरस से जुड़े जोखिमों को देखते हुए इसका टीका समय की जरूरत थी।
