गुर्दे यानी की किडनी हमारे शरीर का एक जरुरी हिस्सा मानी जाती हैं। यह दो बीन्स की तरह के आकार वाले अंग हमारी रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में मौजूद रहते हैं। रोजाना हम जो कुछ भी खाते और पीते हैं, उसका असर हमारी किडनी पर पड़ता है, क्योंकि ये अंग खून को साफ करने, अपशिष्ट बाहर निकालने, शरीर में पानी और खनिजों का संतुलन बनाए रखने और ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने जैसे कई काम करते हैं लेकिन दुःख की बात है कि भारत में लोग गुर्दे की देखभाल को लेकर बहुत कम जागरूक हैं। जब तक कोई लक्षण सामने आता है, तब तक बीमारी काफी ज्यादा बढ़ चुकी होती है और नुकसान स्थायी हो चुका होता है। इसीलिए यह जरूरी है कि आम लोगों को किडनी से जुड़ी बीमारियों और उनकी रोकथाम के बारे में जानकारी दी जाए।

आखिर क्यों जरुरी हैं गुर्दे?

गुर्दे सिर्फ पेशाब बनाने वाले अंग नहीं हैं, बल्कि वो हमारे शरीर की सफाई और संतुलन बनाए रखने का काम करते हैं। उनके प्रमुख कार्य हैं खून में से विषैले पदार्थ और अपशिष्ट हटाना। शरीर में पानी, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम और फॉस्फेट जैसे खनिजों का संतुलन बनाए रखना, शरीर का pH और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखना, ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने वाले हार्मोन (रेनिन) का निर्माण, हड्डियों को मजबूत रखने के लिए विटामिन D को सक्रिय करना, लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में मदद करने वाला हार्मोन (एरिथ्रोपॉयटिन) बनाना, जब ये सभी कार्य बाधित होते हैं, तो पूरे शरीर पर असर पड़ता है जैसे कि दिल, हड्डियाँ, खून, फेफड़े, दिमाग हर अंग इसके कारण प्रभावित हो सकता है।

आखिर क्या है क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD)?

क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी दीर्घकालिक गुर्दा रोग की एक ऐसी स्थिति है जिसमें किडनी धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती है। यह प्रक्रिया महीनों या वर्षों तक बिना किसी लक्षण के चलती रहती है। जब लक्षण दिखने लगते हैं, तब तक 60–70% किडनी पहले ही खराब हो चुकी होती है। वहीं भारत में CKD के सबसे बड़े कारण हैं: डायबिटीज (मधुमेह) और हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप)।

अन्य कारण भी हैं जिम्मेदारी

जैसे कि परिवार में किडनी रोग का इतिहास, बार-बार मूत्र मार्ग संक्रमण होना, मोटापा, धूम्रपान, शराब सेवन, लंबे समय तक पेनकिलर या बिना डॉक्टर की सलाह वाली दवाओं का सेवन, 60 वर्ष से अधिक उम्र होना।

लक्षण

CKD के शुरूआती लक्षण अक्सर नहीं दिखते लेकिन जब बीमारी बढ़ जाती है तो कुछ सामान्य लक्षण दिखाई देने लगते हैं जैसे कि पैरों, चेहरे या पेट में सूजन, थकान और कमजोरी, सांस फूलना, झागदार या बार-बार पेशाब आना, भूख न लगना और उल्टी जैसा महसूस होना, रक्तचाप का बढ़ना। इन लक्षणों को नजरअंदाज करना भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

क्या CKD से किया जा सकता है बचाव?

हां, CKD को रोका जा सकता है या इसकी गति भी धीमी की जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखा जाए। नियमित व्यायाम और संतुलित आहार, पेनकिलर या हर्बल दवाएं बिना डॉक्टर की सलाह के न लें। यदि आप जोखिम वाले समूह में हैं (जैसे डायबिटीज, हाई बीपी, परिवार में इतिहास), तो साल में कम से कम एक बार किडनी की जांच करवाएं – क्रिएटिनिन, eGFR, यूरिन प्रोटीन की जाँच। शुरुआती लक्षण दिखें तो तुरंत नेफ्रोलॉजिस्ट से संपर्क करें।

भारत में CKD की ऐसी है स्थिति

भारत में लगभग 17% जनसंख्या CKD से प्रभावित मानी जाती है लेकिन ज़्यादातर लोग इस बारे में जानते ही नहीं हैं। विशेषज्ञों की भारी कमी है पूरे देश में करीब 2500 नेफ्रोलॉजिस्ट हैं, जबकि आबादी 140 करोड़ से अधिक है। इसका मतलब है कि कई मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता।ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हालत और भी खराब है। वहाँ न तो सही जांच की सुविधा है और न ही विशेषज्ञ डॉक्टर। कई मरीज अंतिम अवस्था में ही अस्पताल आते हैं, जिससे इलाज की संभावना कम हो जाती है। कुछ राज्यों में एक विशेष किस्म की किडनी बीमारी भी पाई गई है, जिसे CKDu (Chronic Kidney Disease of unknown cause) कहते हैं। इसके कारण अब तक स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन यह बीमारी बिना डायबिटीज या बीपी के भी हो रही है।

CKD का असर सिर्फ किडनी तक सीमित नहीं

जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर के अन्य अंगों पर भी बुरा असर पड़ता है। दिल की बीमारियां – हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है, एनीमिया और कमजोरी, हड्डियों की कमजोरी और फ्रैक्चर, बार-बार संक्रमण होना।

CKD का असर सिर्फ किडनी तक ही नहीं है सीमित

जब किडनी ठीक से काम नहीं करती तो शरीर के अन्य अंगों पर भी बुरा असर पड़ता है। दिल की बीमारियाँ – हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है, एनीमिया और कमजोरी, हड्डियों की कमजोरी और फ्रैक्चर, बार-बार संक्रमण होना, मानसिक तनाव और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट
और जल्दी मृत्यु का खतरा

CKD का अंतिम चरण होता है ESRD

जब किडनी पूरी तरह से काम करना बंद कर देती है, तो उसे End Stage Renal Disease (ESRD) कहते हैं। ऐसे में मरीज को जिंदगी भर के लिए डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है लेकिन भारत में इलाज की लागत अधिक होने के कारण कई लोग डायलिसिस शुरू नहीं कर पाते या बीच में ही छोड़ देते हैं। कई बार आर्थिक तंगी के कारण मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुँचते और जान से हाथ धो बैठते हैं।

NHS अस्पताल जालंधर की भूमिका

NHS Hospital, Jalandhar, क्षेत्र का एक प्रमुख और अत्याधुनिक नेफ्रोलॉजी केंद्र है, जहां सभी प्रकार की किडनी समस्याओं के लिए इलाज उपलब्ध है। 24×7 डायलिसिस सेवाएं, ICU और गंभीर रोगियों के लिए विशेष डायलिसिस (CRRT), किडनी बायोप्सी और इंटरवेंशनल प्रक्रियाएं, ब्लड प्रेशर और डायबिटिक किडनी रोग के लिए विशेष क्लिनिक, उन्नत जल शुद्धिकरण प्रणाली और संक्रमण नियंत्रण प्रोटोकॉल हमारा उद्देश्य है – हर वर्ग के मरीज को गुणवत्तापूर्ण, सुलभ और सस्ता इलाज देना।

क्या बदला जा सकता है?

देश में CKD को नियंत्रित करने के लिए इन बातों की जरुरत है। राष्ट्रीय स्तर पर CKD स्क्रीनिंग प्रोग्राम, सरकारी सहायता योजनाएं – जैसे डायलिसिस सब्सिडी, ट्रांसप्लांट में सहायता, ज्यादा नेफ्रोलॉजिस्ट और डायलिसिस तकनीशियनों को प्रशिक्षित करना, आम जनता के लिए जागरूकता अभियान, अंगदान (Organ Donation) को बढ़ावा देना, निजी और सरकारी भागीदारी से ग्रामीण क्षेत्रों तक सेवाएं पहुँचाना

डॉ. संजय कुमार (MBBS, MD मेडिसिन, DrNB नेफ्रोलॉजी) ने दिया लोगों को यह संदेश

“मैंने अपने 7+ वर्षों के करियर में हजारों किडनी मरीजों का इलाज किया है। मेरा अनुभव कहता है कि अगर लोग समय पर जांच करवा लें और शुरुआती लक्षणों को हल्के में न लें, तो CKD को रोका जा सकता है। बीमारी से बचाव इलाज से कहीं बेहतर है।”

इस बात का भी रखें ध्यान

गुर्दे शरीर का मौन लेकिन बेहद जरूरी हिस्सा हैं। थकान, सूजन या पेशाब में बदलाव जैसे मामूली लक्षण भी गंभीर खतरे की घंटी हो सकते हैं। CKD एक “साइलेंट किलर” है – यह बिना शोर किए शरीर को धीरे-धीरे खोखला करता है। अब समय आ गया है कि हम किडनी की सेहत को गंभीरता से लें। स्क्रीनिंग करवाएं, जागरूक रहें और समय पर डॉक्टर से सलाह लें, क्योंकि जब बात किडनी की हो – तो हर दिन, हर जाँच और हर फैसला जिंदगी बचा सकता है।

 

By tnm

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