हाल ही में एक खबर सामने आई है, जहां ऑस्ट्रेलिया की एक 9 साल की बच्ची के साथ मच्छर काटने से हादसा हुआ, जो आम लोगों के लिए एक चेतावनी की तरह है। बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो मच्छर के काटने के बाद नजरअंदाज कर देते हैं पर वहीं कभी-कभी ये छोटी-सी चीज बड़ी परेशानी बन जाती है और ऐसा ही उस बच्ची के साथ हुआ। मच्छर के काटने के बाद बच्ची अब चल नहीं पा रही है।
पूरा मामला
Kidspot नाम की पेरेंटिंग वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक, एक 9 साल की बच्ची एवा अपने परिवार के साथ ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स के एक कैंपसाइट पर गई थी। वहां उसे एक मच्छर ने काट लिया। शुरुआत में तो सब कुछ नॉर्मल ही था, लेकिन जब बच्ची ने उस जगह को बार-बार खुजलाना शुरू किया, तो मामला बिगड़ने लगा।
बच्ची की मां बेक ने बताया कि उन्होंने उस खुजली को कम करने के लिए एंटीबैक्टीरियल मच्छर काटने वाली क्रीम लगाई थी, लेकिन इसके बावजूद, अगले कुछ दिनों में हालत और खराब होती गई। बेक कहती हैं कि चौथे दिन तक वो निशान आकार में दोगुना-सख्त हो गया और पूरी तरह लाल दिखने लगा। बच्ची ने बताया कि उसे उस जगह दर्द भी हो रहा है।
गंभीर हुआ मामला
एक रात में ही वो सूजन तीन गुना बढ़ गया और एवा के लिए चलना मुश्किल हो गया। इसके बाद जब परिवार को लगा कि बात गंभीर है, तो वे डॉक्टर के पास जाना चाहते थे, लेकिन आसपास के सभी डॉक्टर पहले से हफ्तों तक बुक थे। मजबूरी में उन्होंने एक ऑनलाइन नर्स से संपर्क किया। नर्स ने तुरंत सलाह दी कि बच्ची को अस्पताल लेकर जाएं।
अस्पताल में होना पड़ा भर्ती
जैसे ही अस्पताल में डॉक्टर ने बच्ची के घुटने के पीछे का वो संक्रमित हिस्सा देखा, तो वे भी चिंतित हो गया, क्योंकि वो जगह Joint के पास थी और वहां संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा होता है। जांच के बाद पता चला कि एवा को स्टैफ इन्फेक्शन हुआ है। इसके लिए उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और तीन दिन तक इलाज चलता रहा।
MRSA Infection
पहले दौर की एंटीबायोटिक दवाएं असर नहीं दिखा पाईं, और बाद में डॉक्टरों ने बताया कि एवा को MRSA नाम का इन्फेक्शन हो गया है। ये एक खास तरह का स्टैफ इन्फेक्शन होता है, जो एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ बहुत रेसिस्टेंट (प्रतिरोधी) होता है।
इलाज के दौरान कितनी सावधानी रखनी पड़ी
एवा की मां बताती हैं कि इन्फेक्शन उसकी जांघ तक फैल गया था। त्वचा पूरी तरह लाल और गर्म हो गई थी, लिम्फ नोड्स तक सूज गए थे। उन्हें सामान्य बैंड-एड नहीं, बल्कि बड़े हीलिंग पैड लगाने पड़ते थे। इन्हें दिन में 2-3 बार बदलना होता था और ध्यान रखना होता था कि ये गीले न हों।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले डॉक्टर या एक्सपर्ट्स की सलाह जरूर लें।
