विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने तपेदिक (टीबी) के एक नए और अत्याधुनिक परीक्षण को मंजूरी दी है, जो अपनी तरह का पहला परीक्षण है। यह परीक्षण विशेष रूप से उन मरीजों के लिए डिज़ाइन किया गया है जो एंटीबायोटिक प्रतिरोधी टीबी से प्रभावित हैं। पिछले साल टीबी ने 12.5 लाख लोगों की जान ली थी, और यह बीमारी मुख्य रूप से गरीब देशों में गंभीर चुनौती बनी हुई है।
नई तकनीक से बेहतर निदान की संभावना
यह परीक्षण जिसे अमेरिकी कंपनी सेफिड ने विकसित किया है, टीबी के निदान के साथ-साथ दवाओं के प्रति संवेदनशीलता का भी पता लगाने में सक्षम है। यह जीनएक्सपर्ट सिस्टम के साथ मिलकर काम करता है और थूक के नमूनों में टीबी के बैक्टीरिया माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस का पता लगाता है। यह जांच कुछ ही घंटों में परिणाम प्रदान करती है, जिससे उपचार में तेजी लाई जा सकती है।
यह परीक्षण रिफैम्पिसिन प्रतिरोध से जुड़ी म्युटेशन का भी पता लगाता है, जो मल्टीड्रग-रेसिस्टेंट टीबी (MDR-TB) का संकेत हो सकता है। इस परीक्षण का उद्देश्य उन मरीजों का सही समय पर इलाज करना है जिन्होंने टीबी का इलाज शुरू नहीं किया या फिर उनका इलाज अधूरा रह गया।
टीबी: एक जानलेवा बीमारी
टीबी एक ऐसी बीमारी है जो हवा के माध्यम से फैलती है और आमतौर पर फेफड़ों को प्रभावित करती है। हालांकि यह शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकती है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार 2023 में 12.5 लाख लोग इस बीमारी के कारण मरे थे, जिनमें से 1.61 लाख लोग एचआईवी से प्रभावित थे।
टीबी का इलाज संभव है, लेकिन दवा प्रतिरोधी टीबी (MDR-TB) के मामलों ने इसे और भी गंभीर बना दिया है। इस बीमारी के उपचार में देरी या गलत इलाज से मरीजों की जान जाने का खतरा बढ़ जाता है।
भारत में टीबी का बढ़ता संकट
ग्लोबल ट्यूबरक्लोसिस रिपोर्ट 2024 के मुताबिक, टीबी के 56 प्रतिशत मामले भारत, इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस और पाकिस्तान में होते हैं। 2023 में भारत में वैश्विक टीबी के मामलों का 26 प्रतिशत हिस्सा था, जो इस बीमारी के बढ़ते संकट को दर्शाता है।
डब्ल्यूएचओ की भूमिका और भविष्य की योजनाएं
डब्ल्यूएचओ के सहायक महानिदेशक डॉक्टर युकिको नाकातानी ने इस नए परीक्षण को एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया और कहा कि यह देशों को उच्च गुणवत्ता वाले टीबी परीक्षणों तक पहुंच बढ़ाने में मदद करेगा। डब्ल्यूएचओ अब और अधिक परीक्षणों की समीक्षा कर रहा है, ताकि अधिक देशों में सटीक और समयबद्ध टीबी निदान किया जा सके।
इस नई तकनीक से उम्मीद है कि टीबी के इलाज में सुधार होगा और इस बीमारी से जूझ रहे देशों को जल्दी और प्रभावी उपचार मिल सकेगा।
