दुनिया भर में खाद्य निर्धनता एक गंभीर समस्या बन चुकी है, और इसका सबसे बुरा असर बच्चों पर पड़ रहा है। हर चौथा बच्चा खाद्य निर्धनता का शिकार है, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है। भारत में स्थिति और भी विकट है, जहां 76 फीसदी बच्चे इस समस्या से जूझ रहे हैं। इस बढ़ती समस्या के कारण आने वाली पीढ़ी का भविष्य भी खतरे में है।
दुनिया में हर चौथा बच्चा खाद्य निर्धनता का शिकार
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में 5 साल या उससे कम उम्र के हर चौथे बच्चे को खाद्य निर्धनता का सामना करना पड़ रहा है। इसका मतलब यह है कि दुनिया भर में करीब 18.1 करोड़ बच्चे इस गंभीर समस्या से प्रभावित हैं। इनमें से 65 फीसदी बच्चे केवल 20 देशों में रहते हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। दक्षिण एशिया में 6.4 करोड़ और सहारा अफ्रीका में 5.9 करोड़ बच्चे इस समस्या से जूझ रहे हैं।
भारत में खाद्य निर्धनता की भयावह स्थिति
भारत में स्थिति और भी गंभीर है, जहां 76 फीसदी बच्चे खाद्य निर्धनता से पीड़ित हैं। इनमें से 40 फीसदी बच्चे जीवन के शुरुआती वर्षों में गंभीर खाद्य निर्धनता का सामना कर रहे हैं, जबकि 36 फीसदी बच्चे मध्यम स्तर की खाद्य निर्धनता से जूझ रहे हैं। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में पोषण की कमी बच्चों के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है।
कुपोषण का खतरा और मानसिक विकास पर असर
गंभीर खाद्य निर्धनता का शिकार बच्चे अक्सर कुपोषण (वेस्टिंग) के शिकार होते हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक विकास को नुकसान पहुंचाता है। रिपोर्ट के अनुसार ऐसे बच्चों में कुपोषण के कारण मौत की संभावना 50 फीसदी तक बढ़ जाती है। जीवन के शुरुआती वर्षों में बच्चों को पर्याप्त और पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है, ताकि उनका विकास सही तरीके से हो सके।
आर्थिक स्थिति और खाद्य निर्धनता का गहरा संबंध
खाद्य निर्धनता का सबसे बड़ा कारण गरीबी है। विशेषज्ञों का कहना है कि खाद्य निर्धनता के मामलों में करीब आधे परिवार वे हैं जो पहले ही गरीबी से जूझ रहे हैं। बाजार में महंगे खाद्य पदार्थों के बढ़ते मूल्य और परिवारों की बढ़ती वित्तीय समस्याओं के कारण बच्चों को पौष्टिक आहार देना कठिन हो रहा है। इसके अलावा खाद्य कंपनियों द्वारा स्वास्थ्य के लिहाज से हानिकारक खाद्य पदार्थों का बढ़ावा देने से भी यह समस्या और बढ़ रही है।
सिर्फ गरीबों तक सीमित नहीं खाद्य निर्धनता
यह समस्या केवल गरीब परिवारों तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि अमीर परिवारों के बच्चे भी खाद्य निर्धनता से प्रभावित हो रहे हैं, खासकर वे बच्चे जो जंक फूड और अस्वस्थ आहार पर निर्भर रहते हैं। इससे बच्चे जरूरी पोषक तत्वों से वंचित रह जाते हैं, जिससे उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ता है।
महामारी, जलवायु परिवर्तन और संघर्षों का असर
कोविड-19 महामारी और जलवायु परिवर्तन जैसी घटनाओं ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। कई देश जो पहले ही संघर्षों, युद्धों और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित थे, अब खाद्य निर्धनता का सामना कर रहे हैं। सोमालिया और गाजा जैसे क्षेत्रों में खाद्य निर्धनता का स्तर बेहद बढ़ चुका है, जिससे बच्चों में कुपोषण का खतरा और बढ़ गया है।
रिपोर्ट से मिली उम्मीद: कुछ देशों ने दर्ज की प्रगति
हालांकि रिपोर्ट में कुछ देशों द्वारा इस समस्या से निपटने में प्रगति की भी जानकारी दी गई है। उदाहरण के तौर पर बुर्किना फासो में बच्चों में खाद्य निर्धनता का स्तर 2010 में 67 फीसदी था, जो 2021 में घटकर 32 फीसदी हो गया। इसी तरह नेपाल में 2011 में 20 फीसदी और 2022 में 8 फीसदी तक खाद्य निर्धनता में कमी आई है। इन देशों ने स्थानीय स्तर पर पोषक आहार की आपूर्ति बढ़ाने और बच्चों को बेहतर आहार देने के लिए ठोस कदम उठाए हैं।
भारत में भी पोषण की कमी को रोकने की आवश्यकता
भारत में भी यह समस्या बढ़ रही है, जहां दाल, दूध, सब्जियां और फल जैसे पोषक आहार की कीमतों में वृद्धि हो रही है। ऐसे में आम आदमी के लिए पोषण युक्त आहार मिलना मुश्किल होता जा रहा है। यह स्थिति आने वाली पीढ़ी के लिए खतरनाक हो सकती है, क्योंकि पोषण की कमी से बच्चे अंदर ही अंदर खोखले होते जा रहे हैं।
समाधान की दिशा: संयुक्त प्रयास की जरूरत
यूनिसेफ ने सभी देशों से अपील की है कि वे बच्चों के लिए पोषण सुलभ बनाएं और गरीबी को खत्म करने के लिए प्रभावी कदम उठाएं। साथ ही स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने की जरूरत है ताकि हर बच्चे को पर्याप्त पोषण मिल सके। अगर सही कदम उठाए जाएं, तो यह समस्या कमजोर देशों के लिए भी हल हो सकती है।
खाद्य निर्धनता से निपटने के लिए सभी देशों को इस मुद्दे को प्राथमिकता के तौर पर देखना होगा, ताकि भविष्य में बच्चों के लिए बेहतर पोषण उपलब्ध हो सके और उनका शारीरिक एवं मानसिक विकास सही तरीके से हो सके।
