1980 में अफ्रीका और अन्य विकासशील देशों में जहरीला कचरा फेंका जा रहा था और 1988 से, दुनिया भर में एक चौथाई अरब टन से अधिक प्लास्टिक कचरा निर्यात किया गया है। आमतौर पर ग्लोबल नॉर्थ से दक्षिण पूर्व एशियाई देशों और भारत और तुर्की जैसे आम गंतव्यों तक। सार्वजनिक आक्रोश और पर्यावरण जागरूकता के बाद, बेसल कन्वेंशन ने खतरनाक कचरे की सीमा पार आंदोलन को नियंत्रित करने वाला पहला वैश्विक कानूनी साधन, 1989 में विकसित किया गया। कन्वेंशन को अपने संशोधनों के माध्यम से प्लास्टिक कचरे को भी शामिल करने में तीन दशक लग गए, लेकिन बेसल कन्वेंशन प्लास्टिक अपशिष्ट संशोधन 2021 में लागू हुआ।

Waste Colonialism

लेकिन बात ये आती है कि कचरे का व्यापार अभी भी क्यों होता है। वेस्ट कोलोनियालिसम शब्द यानि कचरा उपनिवेशवाद 1989 में एक सम्मेलन की बैठक में गढ़ा गया था, जिसका मेन फोकस उच्च आय वाले देशों से कम आय वाले देशों में कचरे को डंप करना था। इसे (Waste neocolonialism) अपशिष्ट नवउपनिवेशवाद भी कहा जाता है, क्योंकि ये पूर्व औपनिवेशिक राज्यों या आर्थिक परिधि पर अन्य क्षेत्रों में विषाक्त कचरे का प्रत्यक्ष निर्यात है। मलेशिया और भारत, जो पूर्व ब्रिटिश उपनिवेश थे, यूनाइटेड किंगडम से प्लास्टिक कचरा प्राप्त करते हैं, जबकि वियतनाम को यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका से प्लास्टिक कचरा प्राप्त होता है, और इंडोनेशिया को जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ से प्लास्टिक कचरा प्राप्त होता है। इस तरह प्रदूषण का ट्रांसफर एक ऐतिहासिक पर्यावरणीय और सामाजिक अन्याय है।

पिछले वर्ष, चीन ने अपनी नेशनल स्वॉर्ड नीति के माध्यम से प्लास्टिक कचरे के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके परिणामस्वरूप दक्षिण पूर्व एशिया में प्लास्टिक कचरे की आमद हुई, जिससे इन विकासशील देशों में कचरे का स्तर बहुत बढ़ गया।

तथ्यों को अनदेखा करना

अध्ययन और रिसर्च अक्सर प्लास्टिक प्रदूषण के लिए समुद्री कूड़े को या इकट्ठे न किए गए कूड़े को दोषी ठहराता है और एशियाई देशों को हॉटस्पॉट के रूप में इंगित करने वाले डेटा का हवाला देता है। इस तथ्य को नहीं देखा जाता कि ग्लोबल साउथ में प्लास्टिक कचरे का निर्यात जारी है और अगर प्लास्टिक का उत्पादन अभी भी मौजूदा दर पर हो रहा है तो भविष्य में इसमें भारी कमी नहीं आएगी। इन तथ्यों को अनदेखा किया जाता है कि ज्यादातर प्लास्टिक को पर्यावरण के सही तरीके से रिसाइकिल नहीं किया जा सकता है, और प्लास्टिक को पिघलाने, जलाने या बहाने वाली कोई भी प्रक्रिया पर्यावरण को फ़ायदे से ज़्यादा नुकसान पहुँचाती है और समुदायों के स्वास्थ्य को जोखिम में डालती है। इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम और तुर्की जैसे शीर्ष निर्यातक देशों में इसका असर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

ये सिर्फ़ प्लास्टिक प्रदूषण का मामला नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन का भी मामला है। सबसे बड़े जलवायु प्रदूषकों में संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ शामिल हैं, और सबसे बड़े प्लास्टिक निर्माता अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों में हैं। इसमें कोई चौकाने वाली बात नहीं है कि ये देश प्लास्टिक कचरे के सबसे बड़े निर्यातक भी हैं, फिर भी प्लास्टिक प्रदूषण का दोष और बोझ एशियाई देशों पर ही है, क्योंकि ये समुदाय जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं।

Intergovernmental Negotiating Committee (INC-5)

नवंबर के अंत में वैश्विक प्लास्टिक संधि पर अंतर-सरकारी वार्ता समिति (INC-5) के पांचवें सत्र की शुरूआत हो चुकी है, जो 25 नवंबर से 1 दिसंबर तक बुसान में किया जा रहा है। दुनिया के नेताओं के पास प्लास्टिक प्रदूषण के बिगड़ते प्रभावों को संबोधित करने के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है। इस संधि में स्रोत पर प्लास्टिक उत्पादन को कम करने, एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को प्रभावित करने वाले खतरनाक रसायनों को खत्म करने और प्लास्टिक प्रदूषण को दूर करने के लिए पुन: उपयोग को संस्थागत बनाने जैसे प्रावधान शामिल करके इसे और अधिक संबोधित किया जा सकता है।

By tnm

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