नवंबर के आखिरी हफ्ते में जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में बर्फबारी हुई थी, और ये उम्मीद थी कि पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में भी इसी तरह का मौसम होगा, लेकिन अभी तक उत्तराखंड के पहाड़ों पर बर्फबारी और बारिश का इंतजार किया जा रहा है। जानकारी के अनुसाप उत्तराखंड के पहाड़ों में 80 फीसदी से ज्यादा खेती बारिश पर निर्भर है। बारिश न होने की वजह से गेहूं, जौ और मसूर जैसी फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं।
जिस वजह से किसान बुवाई नहीं कर पाए और खेत सूखे, बंजर रह गए। वहां के किसानों का कहना है कि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ, गेहूं की बुवाई के लिए हमेशा बारिश मिल ही जाती थी। मौसम सबसे ज्यादा छोटे किसानों पर भारी पड़ रहा है। कोई भी इन छोटे किसानों के हालात नहीं समझ पाता।
उत्तराखंड में सामान्य से 90 प्रतिशत कम बारिश
आपको बता दें कि सितंबर के बाद राज्य के किसानों को कम बारिश मिली। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 1 अक्टूबर से 24 नवंबर के बीच उत्तराखंड में सामान्य से लगभग 90 प्रतिशत कम बारिश हुई है। बात पिथौरागढ़ और बागेश्वर की करें तो इन्हें छोड़कर बाकी 11 जिले पूरी तरह सूखे हैं। उत्तराखंड में 86 प्रतिशत से ज़्यादा पहाड़ हैं और ज़्यादातर सिंचाई आधारित खेती मैदानी इलाकों तक ही सीमित है और पहाड़ी क्षेत्र में सिर्फ़ 14 प्रतिशत ज़मीन सिंचित है।
जम्मू और कश्मीर में 68 प्रतिशत की कमी बारिश में दर्ज की गई है। जानकारी के अनुसार पता चला है कि पिछले 123 सालों में अक्तूबर हिमाचल प्रदेश में तीसरा सबसे सूखा महीना रहा, जिसमें 97 प्रतिशत कम बारिश हुई। वैसे सालमें सबसे कम बारिश मानसून के जाने के बाद अक्टूबर और दिसंबर के बीच होती है और नवंबर को वर्ष का सबसे शुष्क महीना माना जाता है।
आमतौर पर, अक्टूबर और दिसंबर के बीच, उत्तराखंड में औसतन 55 मिलीमीटर बारिश होती है। अक्टूबर में 31 मिमी, नवंबर में 6.4 मिमी और दिसंबर में 17.6 मिमी। मानसून के दौरान, औसत वर्षा 1,162 मिमी, प्री-मानसून में 185 मिमी और सर्दियों में 101 मिमी होती है।
Western Disturbances
बता दें कि वेस्टर्न डिस्टर्बन्स मौसम प्रणाली है जो भूमध्य सागर और आसपास के क्षेत्रों से उत्पन्न होती है। जैसे-जैसे ये पूर्व की ओर बढ़ते हैं, वे हिंदू कुश पर्वत श्रृंखलाओं से जुड़ते हैं और फिर उत्तरी भारत और हिमालयी क्षेत्रों की ओर। ये डिस्टर्बनस बारिश और बर्फबारी लाते हैं, जो किसानों के फसल चक्र के लिए महत्वपूर्ण हैं, जल स्रोतों को फिर से भरते हैं और ग्लेशियरों में बर्फ जोड़ते हैं।
हाल ही में वेस्टर्न डिस्टर्बन्स में बदलाव देखे गए हैं और इन्हें वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जा रहा है। एक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक गर्मियों के महीनों में वेस्टर्न डिस्टर्बन्स में वृद्धि हुई है, जबकि पहले ऐसा कम ही होता था। पिछले 20 वर्षों में जून में वेस्टर्न डिस्टर्बन्स की संख्या पिछले 50 वर्षों की तुलना में दोगुनी हो गई है।
गेहूं की बुवाई के लिए अभी लंबा इंतजार बाकी
पिछले साल भी गर्मी के महीनों में उत्तर भारत में वेस्टर्न डिस्टर्बन्स का असर अधिक देखने को मिला, जबकि मानसून के बाद की बारिश कम हुई है। इसका मतलब ये कि गेहूं की बुवाई के लिए खेतों की तैयारी कर रहे किसानों का लंबा इंतजार अभी खत्म नहीं हुआ है।
