सारकोमा कैंसर की शुरूआत सॉफ्ट टिशूज या हड्डियों से होती है और ये शरीर के कनेक्टिव टिशूज में पैदा होता है। ये एक रेयर और जानलेवा किस्म का केंसर है। इसकी पहचान एकदम लास्ट समय में होती है, इसी वजह से इसका इलाज मुश्किल हो जाता है।
किस अंग में खतरा ज्यादा
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सारकोमा कैंसर शरीर के किसी भी हिस्से में विकसित हो सकता है। लेकिन सिर, गर्दन, चेस्ट, हाथ, पैरों में ये सबसे ज्यादा पाया जाता है। ये धीरे-धीरे इंसान के शरीर में फैलता है। कुछ केस में ये इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि उस अंग को सर्जरी से काटकर बाहर निकाला जाता है।
इसके लक्षण
सबसे कॉमन लक्षण है गांठ बनना और दर्द। दूसरे लक्षणों में थकान, बुखार, बिना कारण वजन कम होना, त्वचा में परिवर्तन, सूजन जैसी समस्याएं शामिल हैं। कई बार त्वचा के नीचे गांठ बन जाती है जो दर्द भी नहीं करती है। इस केंसर के आगे काफी प्रकार है, जैसे कि सॉफ्ट टिशूज में सरकोमा कैंसर। इसमें सॉफ्ट टिशूज में मांसपेशियां, फैट, और रक्त वाहिकाएं होती हैं। सॉफ्ट टिशू सारकोमा के भी अलग-अलग प्रकार होते हैं, जैसे कि लिपोसारकोमा, लियोमायोसारकोमा ,रब्डोमायोसारकोमा और फाइब्रोसारकोमा।
इसके बाद आता है हड्डियों का सरकोमा कैंसर। इसके होने का कारण अभी तक पता नहीं चल पाया है। हड्डियों में होने वाले सारकोमा को ऑस्टियोसारकोमा, कोंड्रोसारकोमा और इविंग सारकोमा कहा जाता है। ऑस्टियोसारकोमा में हाथ-पैर की हड्डियां प्रभावित होती हैं। ये पसलियों, कंधे के ब्लेड, कूल्हों और पैरों जैसी लंबी हड्डियों में जन्म लेता है।
किन्हें ज्यादा खतरा
इसका सही तरीके से कोई कारण पता नहीं लग पाया है, ये जेनेटिक भी हो सकता है। पुरुषों, मोटापे के शिकार लोगों में, बच्चों और किशोरों में, कमजोर इम्यून सिस्टम वाले बच्चे में, केमिकल्स के संपर्स में रहने वाले और ज्यादा स्मोकिंग, शराब पीने वालों को इसका ज्यादा खतरा रहता है।
इसका इलाज
इसका इलाज इसके प्रकार, आकार और स्टेज पर निर्भर करता है। सर्जरी, कीमोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, टार्गेट थेरेपी, रेडिएशन थेरेपी से इलाज किया जाता है। इसकी पहचान करने के लिए सीटी MRI, स्कैन अनुवांशिकी चेकअप और एक्स-रे किया जाता है।
