भारत में हर दिन करीब 8 महिलाएं गर्भपात के कारण अपनी जान गंवा देती हैं, और 67% गर्भपात में मौत का खतरा होता है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की विश्व जनसंख्या रिपोर्ट 2022 के अनुसार भारत में रोजाना लगभग 3.31 लाख महिलाएं बिना योजना के गर्भवती हो जाती हैं, जो सालाना 12.10 करोड़ तक पहुंच जाता है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि गर्भपात से संबंधित जोखिम और उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर जागरूकता की बहुत आवश्यकता है।

अबॉर्शन क्या है

अबॉर्शन जिसे आम बोलचाल में गर्भपात कहा जाता है, वह प्रक्रिया है जिसमें एक महिला के गर्भ से भ्रूण को बाहर निकाला जाता है। यह प्रक्रिया प्रेगनेंसी के 37 हफ्ते तक की जा सकती है, लेकिन यदि 24 हफ्ते के भीतर भ्रूण का गर्भ में विकास रुक जाता है या यदि मां को बच्चे को जन्म नहीं देना होता, तो मेडिकल माध्यम से गर्भपात कराया जाता है।

अबॉर्शन का निर्णय कई कारणों से लिया जा सकता है, जैसे गर्भ में पल रहे बच्चे की शारीरिक या मानसिक समस्या, मां की सेहत से जुड़ी समस्याएं, या यदि मां किसी कारणवश बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती। कई बार गर्भपात प्राकृतिक रूप से भी हो जाता है, जैसे किसी शारीरिक समस्या या दुर्घटना के कारण।

अबॉर्शन के लिए सुरक्षित समय क्या है?

गायनाकोलॉजिस्ट्स के अनुसार सबसे सुरक्षित समय 12 हफ्ते तक का है। इस दौरान गर्भ में पल रहे भ्रूण का विकास शुरुआती चरण में होता है, और इसे चिकित्सा के माध्यम से समाप्त करना अपेक्षाकृत सुरक्षित होता है। अगर गर्भावस्था के 12 हफ्ते के बाद अबॉर्शन की जरूरत हो, तो यह एक बड़ा जोखिम पैदा कर सकता है, क्योंकि इस दौरान बच्चा अधिक विकसित हो चुका होता है। इसके अलावा 12 हफ्ते के बाद अबॉर्शन कराने से मां की सेहत पर भी विपरीत असर पड़ सकता है।

24 हफ्ते तक अबॉर्शन तब संभव है जब भ्रूण में कोई गंभीर एब्नॉर्मलिटी हो या अगर मां की जान को खतरा हो। हालांकि 24 हफ्ते में अबॉर्शन कराने से मां की सेहत पर खतरे का जोखिम बढ़ सकता है, इसलिए इसे अंतिम विकल्प के रूप में ही लिया जाता है।

अबॉर्शन से जुड़ा नया कानून

भारत में गर्भपात को लेकर एक नया कानून भी लागू किया गया है। एमपीटी संशोधन बिल 2020 के अनुसार:

12 हफ्ते तक

महिला को डॉक्टर से सलाह लेकर गर्भपात कराया जा सकता है।

12 से 20 हफ्ते

यदि गर्भपात की आवश्यकता हो, तो इसे डॉक्टर के परामर्श से किया जा सकता है।

20 से 24 हफ्ते

इस अवधि में गर्भपात की अनुमति कुछ विशिष्ट स्थितियों में, जैसे भ्रूण में गंभीर समस्या या मां की सेहत पर खतरे की स्थिति, पर दो डॉक्टरों की सलाह पर दी जा सकती है।

24 हफ्ते के बाद

अगर गर्भवती महिला की सेहत पर गंभीर खतरा हो या भ्रूण में कोई गंभीर समस्या हो, तो इसके लिए एक मेडिकल बोर्ड की सलाह ली जानी चाहिए।

यह कानून प्रेगनेंसी के दौरान महिला की जान को खतरे से बचाने के लिए बनाया गया है, और यह सुनिश्चित करता है कि गर्भपात तब ही किया जाए जब यह महिला की शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए जरूरी हो।

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी केवल जागरूकता के लिए है और किसी भी चिकित्सा सलाह का विकल्प नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए हमेशा विशेषज्ञ से सलाह लें।

By tnm

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