हाल ही में टेलीविजन की मशहूर एक्ट्रेस युविका चौधरी ने सी-सेक्शन के जरिए एक प्यारी बेटी को जन्म दिया। हालांकि, मां बनने के बाद युविका की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। एक ब्लॉग के जरिए उन्होंने बताया कि उनकी बेटी की तबीयत खराब हो गई है और परीक्षण में पता चला कि उसे पीलिया (जॉन्डिस) हो गया है। यह जानकर कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि नवजात शिशुओं को जन्म के बाद पीलिया क्यों होता है। ऐसे में चलिए इसके बारे में जानते हैं।
नवजात पीलिया: क्या है यह

नवजात पीलिया एक सामान्य स्थिति है और इसे अक्सर चिंता का कारण नहीं माना जाता। इसका मुख्य कारण नवजात के शरीर में बिलीरुबिन का स्तर बढ़ना है, जो लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने के कारण बनता है। जब नवजात का लिवर इस बिलीरुबिन को तेजी से बाहर नहीं निकाल पाता, तब पीलिया की समस्या उत्पन्न होती है।
पीलिया के कारण
लिवर का सही से विकास न होना
नवजात शिशुओं का लिवर पूरी तरह विकसित नहीं होता, जिससे यह बिलीरुबिन को प्रोसेस करने में सक्षम नहीं होता। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, लिवर विकसित होता है और यह बिलीरुबिन को सामान्य रूप से प्रोसेस कर लेता है।
अधिक बिलीरुबिन उत्पादन
जन्म के समय, शिशुओं में लाल रक्त कोशिकाओं की अधिकता होती है, जो तेजी से टूटती हैं और इस प्रक्रिया में अधिक बिलीरुबिन उत्पन्न होता है।
मां के दूध का प्रभाव
कुछ मामलों में, मां के दूध में ऐसे तत्व होते हैं जो लिवर की बिलीरुबिन प्रोसेसिंग को धीमा कर सकते हैं। इसे ब्रेस्ट मिल्क जॉन्डिस कहा जाता है, जो आमतौर पर कुछ हफ्तों में ठीक हो जाता है।
ब्लड ग्रुप का मैच न होना
यदि मां और बच्चे के ब्लड ग्रुप में असंगति होती है, तो इससे रक्त कोशिकाओं का तेजी से टूटना संभव होता है, जिससे बिलीरुबिन का स्तर बढ़ता है।
पीलिया का इलाज और देखभाल
फोटोथेरेपी
पीलिया के स्तर को नियंत्रित करने के लिए फोटोथेरेपी का उपयोग किया जाता है, जिसमें नीली रोशनी का इस्तेमाल होता है। यह प्रक्रिया बिलीरुबिन को तोड़कर उसे शरीर से बाहर निकालने में मदद करती है।
धूप में रखना
हल्के मामलों में बच्चे को हल्की धूप में कुछ देर रखने से भी बिलीरुबिन का स्तर कम हो सकता है।
ज्यादा दूध पिलाना
मां का दूध नियमित रूप से पिलाने से भी पीलिया ठीक करने में मदद मिलती है, क्योंकि इससे शरीर से बिलीरुबिन का निष्कासन होता है।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां
नवजात पीलिया आमतौर पर कुछ हफ्तों में ठीक हो जाता है। हालांकि यदि बिलीरुबिन का स्तर बहुत अधिक हो, तो चिकित्सा सलाह लेना आवश्यक है। इससे बच्चे के मस्तिष्क पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, यह सुनिश्चित करने के लिए डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।
