इन दिनों सरोगेसी के जरिए कई कपल्स पेरेंट्स बनने का सपना पूरा कर रहे हैं। दरअसल आजकल की खराब लाइफस्टाइल और अन्य हेल्थ प्रॉब्लम की वजह से बहुत से कपल्स पेरेंट्स न बनने की समस्या से परेशान है। ऐसे में सरोगेसी उनके लिए बेहतर ऑप्शन है। हालांकि बहुत से लोगों के मन आता है कि अगर वो बच्चे के लिए सरोगेसी का सहारा लेते हैं तो क्या स्पर्म और एग डोनेट करने वाले व्यक्ति का भी बच्चे पर कानूनी अधिकार होगा, तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।
हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि स्पर्म और एग डोनेट करने वाले व्यक्ति को उससे जन्मे बच्चे पर कोई कानूनी अधिकार नहीं होता। बता दें कि यह निर्णय 42 वर्षीय एक महिला के मामले में आया, जिसमें उसने अपनी पांच साल की जुड़वा बेटियों से मिलने के अधिकार की मां की थी। इस मामले में कोर्ट ने यह भी कहा कि स्पर्म और एग डोनर केवल जेनेटिक माता-पिता हो सकते हैं, लेकिन बायोलॉजिकल नहीं। कोर्ट का यह फैसला सरोगेसी और डोनर से जुड़े कानूनी मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
क्या है पूरा मामला
मामले की शुरुआत मुंबई के एक दंपति से हुई, जो गर्भधारण करने में असमर्थ थे। इस दंपति ने सरोगेसी का सहारा लिया, जिसमें महिला की छोटी बहन ने स्वेच्छा से एग डोनेट किए थे। अगस्त 2019 में सरोगेसी से जुड़वा लड़कियों का जन्म हुआ। हालांकि उसी साल एक सड़क दुर्घटना में एग डोनर महिला के पति और बेटी की दुखद मृत्यु हो गई, जिसके बाद वह अपनी बड़ी बहन और जीजा के साथ रहने लगी।
पारिवारिक विवाद और कानूनी लड़ाई
2021 में किसी बात को लेकर घर में कलह उत्पन्न हो गई। इस विवाद के कारण याचिकाकर्ता महिला का पति अपनी दोनों बच्चियों को लेकर अलग रहने लगा। एग डोनर बहन भी अपने जीजा के साथ ही रहने लगी और बड़ी बहन को उसकी बच्चियों से मिलने से रोक दिया गया। इस स्थिति से परेशान होकर याचिकाकर्ता महिला ने अपने पति के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। मामले की सुनवाई पहले लोकल कोर्ट में हुई, जहां महिला की अपील खारिज कर दी गई।
हाईकोर्ट का आदेश, निचली अदालत का फैसला पलटा
महिला ने लोकल कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और याचिकाकर्ता महिला के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि एग डोनर महिला बच्चों की बायोलॉजिकल मां नहीं हो सकती क्योंकि उसने स्वेच्छा से एग डोनेट किए थे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एग डोनर महिला को बच्चियों पर अपने सारे अधिकार छोड़ने होंगे।
कोर्ट के निर्देश, बच्चों से मिलने का अधिकार
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता महिला को अपनी जुड़वा बच्चियों से मिलने का अधिकार है। हर सप्ताह वह तीन घंटे के लिए अपनी बच्चियों से मिल सकेगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता महिला और उसका पति ही कानूनी रूप से बच्चियों के माता-पिता हैं। इस फैसले में कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जेनेटिक संबंध के बावजूद एग और स्पर्म डोनर कानूनी रूप से माता-पिता के अधिकार नहीं रख सकते।
सरोगेसी और डोनर कानून पर प्रभाव
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला भारत में सरोगेसी और डोनर कानून से संबंधित मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण मिसाल है। यह फैसला उन दंपतियों के लिए मार्गदर्शक बनेगा जो सरोगेसी या डोनर सहायता से माता-पिता बनने का निर्णय लेते हैं। साथ हीम इस फैसले से एग और स्पर्म डोनर की कानूनी स्थिति भी स्पष्ट हुई है, जो भविष्य में ऐसे मामलों में विवादों को सुलझाने में मदद करेगी।
