सिज़ोफ्रेनिया एक मानसिक रोग है जिसमें व्यक्ति की विचारशक्ति, भावनाएं और व्यवहार पर असर पड़ता है। यह रोग अकसर जनरेशन वाईज परिवारों में पाया जाता है। दरअसल एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसमें जीनेटिक कारक भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि अभी तक इसके होने का कोई सटीक वजह का पता नहीं चला है। लेकिन जेनेटिक, वातावरण, और दिमाग में हुए रासायनिक बदलाव (ब्रेन केमिस्ट्री) और संरचना, इसकी वजह हो सकती है।
वहीं इस बीमारी से पीड़ित पेशेंट के विचार और व्यवहार वास्तविकता या सच्चाई से कोई संबंध नहीं होता है। मतलब कि इस बीमारी में मरीज की ठीक से सोचने, महसूस करने, और बर्ताव करने की क्षमता प्रभावती होती है। ऐसे में आप इन लक्षणों को समय रहते पहचान कर इस समस्या से बच सकते हैं। चलिए इसके लक्षणों के बारे में जानते हैं
सिज़ोफ्रेनिया की सामान्य लक्षणों में ये शामिल हो सकते हैं
विचारों में अस्पष्टता
अगर कोई व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित है तो उसके विचारशक्ति में अस्पष्टता होती है, जिससे उन्हें व्यक्तिगत, सामाजिक या पेशेवर जीवन में समस्याएं हो सकती हैं।
आवाजें सुनना या विचारना
इस बीमारी में व्यक्ति को अनवांछित आवाजें सुनाई देती हैं या उसके मन में फालतू के विचार आते हैं, जो उनकी निजी लाइफ को प्रभावित कर सकते हैं।
भावनात्मक अस्थिरता
इस बीमारी के लक्षणों में एक भावनात्मक अस्थिरता भी है। दरअसल इस बीमारी से ग्रसित मरीज अकारण ही बहुत ज्यादा परेशान रहता है या एक दम से बहुत ज्यादा उत्साह से भर जाता है। जिस वजह से मरीज को आगे चल कर अक्सर मुसीबत में पड़ जाते हैं।
व्यवहार में असामान्यता
इस बीमारी में व्यक्ति का व्यवहार असामान्य हो सकता है, जैसे कि बिना बात के बहुत ज्यादा हंसना, गुस्सा करना, अचानक से रोने लगना आदि शामिल है।
सामाजिक संबंधों में समस्याएं
सिज़ोफ्रेनिया वाले व्यक्ति के लिए सामाजिक संबंधों में समस्याएं बढ़ जाती हैं, जो उनके दिनचर्या और व्यक्तित्व पर असर डाल सकती हैं।
कैसे इस बीमारी से बचा जा सकता है
सिज़ोफ्रेनिया के लक्षण हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं और इनका प्रबंधन चिकित्सा द्वारा किया जाता है। यह रोग अक्सर जीवन के जन्म से या मध्यकालीन दौर यानी 30 से 40 साल की एज के बीच प्रकट होता है और लंबे समय तक दवाओं और प्राथमिक देखभाल की आवश्यकता होती है।
