एक तरफ जहां लोगों का भीषण गर्मी से जीना बेहाल हो गया है, वहीं दूसरी तरफ लोगों में गर्मियों की वजह से आत्महत्या और डिप्रेशन के मामले भी बढ़ रहे हैं। केंद्र की तरफ से जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक मार्च से मई तक करीब 25 हजार हीटस्ट्रोक के मामले सामने आए। जिसमें से 56 लोगों की मौत हो गई है। ऐसे में कुछ स्टडीज ने दावा किया है कि बहुत ज्यादा तापमान से केवल शरीर ही प्रभावती नहीं होता है बल्कि मेंटल हेल्थ पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। खासकर उन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा है जो पहले से ही स्ट्रेस और डिप्रेशन की दवा ले रहे हैं। इतना ही नहीं लोगों में खुदखुशी करने के मामले भी बढ़ने लगते हैं। चलिए इसके बारे में जानते हैं।

आखिर क्या है स्टडी

फरवरी 2022 में अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के जर्नल जेएएमए साइकेट्री में पब्लिश रिपोर्ट में 2.2 मिलियन लोगों का मेडिकल रिकॉर्ड दर्ज है। जो साल 2010 से 2019 के बीच अस्पतालों के इमरजेंसी विभाग में भर्ती हुए थे। रिपोर्ट के मुताबिक इन सालों के बीच 8 फीसदी गर्म दिनों में इमरजेंसी विजिट बढ़ी थी। इसमें वे लोग भी शामिल थे जो स्ट्रेस, डिप्रेशन, नशा के शिकार, एंजाइटी और आत्महत्या करने की कोशिश किये थे।

वहीं द लैंसेट के प्लानेटरी हेल्थ में पब्लिश रिपोर्ट के मुताबिक  तापमान के बढ़ते हरेक डिग्री के साथ डिप्रेशन और एंजाइटी के पेशेंट में भी काफी वृद्धि हुई थी। साथ ही बांग्लादेश में हुई जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी की स्टडी के मुताबिक जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी, डिप्रेशन के पेशेंट के मामलों में इजाफा होता जाएगा। इतना ही नेचर क्लाइमेट चेंज में पब्लिश स्टडी में शोधकर्ताओं ने बताया कि अमेरिका और मैक्सिको में जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है वैसे-वैसे लोगों में खुदखुशी करने के मामले भी बढ़ रहे हैं।

तापमान और से मेंटल हेल्थ का संबंध

बता दें कि बॉडी के टेम्परेचर को मेंटेन रखने में दिमाग का अहम भूमिका होती है। दरअसल दिमाग के नीचे एक हाइपोथैलेमस होता है जो बॉडी के तापमान को मेंटेन करने का काम करता है। जब हाइपोथैलेमस के जरिए स्किन और शरीर के दूसरे अंगों से बढ़ते या घटते तापमान का सिग्नल मिलता है तो यह प्रतिक्रिया देता है। वहीं जब बॉडी का टेम्परेचर एक दम से कम हो जाता है तो हाइपोथैलेमस के जरिए मांसपेशियां तेजी से फैलती और सिकुड़ती हैं। जिस वजह से हमारी मांसपेशियां कांपने लगती है। जिससे गिरा हुआ टेंपरेचर बैलेंस में आ जाता है। ठीक वैसे ही गर्मियों में भी ऐसा ही होता है। जब टेंपरेचर एक दम से बढ़ जाता है तो हाइपोथैलेमस से स्वेद ग्रंथियों को ज्यादा पसीना लाने का सिग्नल मिलता है। जिस वजह से पसीना सूखता है और शरीर का तापमान बैलेंस में आ जाता है।

आखिर हीटस्ट्रोक कैसे होता है

बता दें कि हीट स्ट्रोक गर्मी से होने वाली सबसे गंभीर बीमारी है। यह तब होता है जब हाइपोथैलेमस शरीर के तापमान को नियंत्रित नहीं कर पाता है। इस दौरान शरीर का तापमान तेजी से बढ़ता है, पसीना तंत्र काम नहीं करता है और शरीर ठंडा होने में असमर्थ हो जाता है। जिस वजह से व्यक्ति को चक्कर आना, घबराहट होना, चिड़चिड़ापन आदि लक्षण नजर आते हैं।

इतना ही नहीं लोगों को हीट स्ट्रोक की वजह से अच्छे से नींद नहीं आती है। वहीं लोगों को गर्मी बढ़ने पर एसी या कूलर के बगैर नींद नहीं आती है। ऐसे में उनकी नींद पूरी नहीं होती है और वो स्ट्रेस और डिप्रेशन के शिकार होने लगते हैं। खासतौर पर वो लोग जो पहले से डिप्रेशन या फिर बाईपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित है, उनकी बीमारी और भी ज्यादा बढ़ जाती है। कई बार लोगों पर डिप्रेशन इतना हावी होता है कि वो लोग आत्महत्या करने की भी कोशिश करने लगते हैं।   

By tnm

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